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फैक्ट शीट से परे: NFHS डेटा रणनीति में सरकार के बदलाव को समझें

केंद्र ने 'गायब' NFHS संकेतकों पर चिंताओं को किया खारिज, कहा- फैक्ट शीट अंतिम रिपोर्ट नहीं है

द्वारा बिज़नेस डेस्कप्रकाशित 7 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
फैक्ट शीट से परे: NFHS डेटा रणनीति में सरकार के बदलाव को समझें
फैक्ट शीट से परे: NFHS डेटा रणनीति में सरकार के बदलाव को समझें

केंद्र ने स्पष्ट किया है कि नवीनतम NFHS-6 फैक्ट शीट में कुछ मेट्रिक्स का न होना राष्ट्रीय डेटा रिपोर्टिंग को सुव्यवस्थित करने का एक सोचा-समझा कदम है।

सप्ताह भर से विश्लेषक और सार्वजनिक स्वास्थ्य शोधकर्ता नवीनतम नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) की फैक्ट शीट का विश्लेषण कर रहे थे और उन्होंने कई पुराने संकेतकों की स्पष्ट अनुपस्थिति पर गौर किया। जब इस बात को लेकर चर्चा तेज हुई कि डेटा सेट छोटा हो रहा है, तो केंद्र ने स्पष्टीकरण दिया: गायब डेटा गायब नहीं हुआ है, बल्कि यह 'डेटा सामंजस्य' (data harmonisation) की दिशा में एक जानबूझकर उठाया गया कदम है।

सरकारी अधिकारियों ने कहा कि अब तक जारी की गई फैक्ट शीट अंतिम रिपोर्ट नहीं हैं। इसके बजाय, वे नीति-प्रासंगिक निष्कर्षों का एक संक्षिप्त सारांश हैं। इस मामले से जुड़े लोगों के अनुसार, इसके पीछे की रणनीति प्रयासों के दोहराव को रोकना है। विशिष्ट मेट्रिक्स को उनके सबसे आधिकारिक चैनलों में डालकर, सरकार भारत के विकसित होते सांख्यिकीय ढांचे पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है।

गायब डेटा कहाँ गया

इसके पीछे तर्क यह है कि भारत का डेटा इकोसिस्टम अब केवल एक सर्वेक्षण पर निर्भर नहीं है। 'स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण' जैसे विशेष प्लेटफॉर्म अब स्वच्छता डेटा संभालते हैं, जबकि स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन की कवरेज को समर्पित प्रशासनिक पोर्टलों के माध्यम से ट्रैक किया जाता है। सरकार का दावा है कि इन मेट्रिक्स को NFHS से हटाकर, वह उत्तरदाताओं पर बोझ कम कर रही है और यह सुनिश्चित कर रही है कि सबसे विश्वसनीय, सर्वेक्षण-विशिष्ट डेटा ही प्राथमिक स्रोत बना रहे।

इसी तरह, जन्म पंजीकरण और मृत्यु दर जैसे जनसांख्यिकीय आंकड़े अब सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) से जोड़े जा रहे हैं। एनीमिया के अनुमानों की अनुपस्थिति के बारे में अधिकारियों ने बताया कि पिछले दौर में इस्तेमाल की गई कैपिलरी ब्लड सैंपलिंग पद्धति ने तकनीकी चिंताएं पैदा की थीं। नतीजतन, सरकार ने वर्तमान फैक्ट शीट में उस विशिष्ट माप को शामिल नहीं करने का विकल्प चुना, ताकि भविष्य की रिपोर्टिंग के लिए अधिक कठोर दृष्टिकोण अपनाया जा सके।

यह क्यों मायने रखता है

यह बदलाव 'एक ही मॉडल' वाले सर्वेक्षण से हटकर एक अधिक खंडित, लेकिन कथित तौर पर विशेष डेटा परिदृश्य की ओर संक्रमण को दर्शाता है। हालांकि इसका उद्देश्य दोहराव से बचना और सामंजस्य में सुधार करना है, लेकिन चुनौती पहुंच की है। शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के लिए, 'गायब' संकेतक सिर्फ संख्याएं नहीं हैं; वे ऐतिहासिक कड़ियां हैं। जब इन मेट्रिक्स को कई प्रशासनिक डेटाबेस में विभाजित किया जाता है, तो भारत की विकास यात्रा का दीर्घकालिक दृष्टिकोण बनाए रखना काफी जटिल हो जाता है।

अंततः, एक सांख्यिकीय प्रणाली की परिपक्वता का आकलन केवल उसके व्यक्तिगत सर्वेक्षणों की सटीकता से नहीं, बल्कि इस बात से किया जाता है कि उसके नागरिक और विशेषज्ञ कितनी आसानी से प्रगति को ट्रैक कर सकते हैं। यदि सरकार का 'सामंजस्य' का वादा पूरा होता है, तो अंतिम परिणाम अर्थव्यवस्था और समाज की अधिक सटीक तस्वीर होनी चाहिए। हालांकि, जैसे-जैसे रिपोर्टिंग ढांचा विकसित हो रहा है, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सरकार पर होगी कि ये अलग-अलग प्लेटफॉर्म पारदर्शी, एकीकृत और सार्वजनिक जांच के लिए खुले रहें।

द्वारा बिज़नेस डेस्क
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