ब्याज दरें घटाने से पहले RBI इनपुट लागत पर क्यों रख रहा है पैनी नजर
अर्थव्यवस्था के 'ओवरहीटिंग' के संकेत बहुत कम हैं: सौगत भट्टाचार्य
MPC सदस्य सौगत भट्टाचार्य का कहना है कि भले ही अर्थव्यवस्था में 'ओवरहीटिंग' के संकेत कम हैं, लेकिन खुदरा महंगाई का असर भविष्य की नीति के लिए एक महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अगले कदम को लेकर चल रही बहस अब खुदरा महंगाई के गणित पर केंद्रित हो गई है। केंद्रीय बैंक के हालिया अनुमान कच्चे तेल की औसत कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल पर आधारित थे, ऐसे में वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में आई नरमी एक राहत दे सकती है। मौद्रिक नीति समिति (MPC) के सदस्य सौगत भट्टाचार्य का मानना है कि हालांकि ये वैश्विक अनुकूल स्थितियां सकारात्मक हैं, लेकिन इनपुट लागत का अर्थव्यवस्था के व्यापक दायरे में पहुंचना नीति निर्माताओं के लिए मुख्य चुनौती बना हुआ है।
महंगाई और विकास का संतुलन
कई जानकारों के लिए मुख्य सवाल यह है कि क्या मौजूदा विकास दर रेपो रेट में बदलाव या ठहराव को सही ठहराती है। भट्टाचार्य बताते हैं कि आर्थिक परिदृश्य काफी जटिल है; हालांकि RBI ने FY27 के लिए अपने महंगाई अनुमानों को बढ़ाकर हेडलाइन के लिए 5.1% और कोर के लिए 4.7% कर दिया है, लेकिन ऐसे संकेत बहुत कम हैं कि अर्थव्यवस्था 'ओवरहीट' हो रही है। रेपो रेट FY27 की अनुमानित महंगाई से केवल 15 आधार अंक ऊपर है, लेकिन ब्याज दरों का वास्तविक असर मनी मार्केट और बॉन्ड यील्ड में कहीं अधिक स्पष्ट रूप से महसूस किया जा रहा है, जो अपने सामान्य स्तर से ऊपर पहुंच गए हैं।
MPC फिलहाल 'सेकंड-ऑर्डर इफेक्ट्स' यानी इनपुट लागत में बढ़ोतरी का खुदरा कीमतों पर पड़ने वाले असर की बारीकी से जांच कर रही है। ये प्रभाव आमतौर पर कोर CPI घटकों में दिखाई देते हैं, जिनमें ईंधन या कीमती धातुओं जैसी अस्थिर श्रेणियों को शामिल नहीं किया जाता। ये लागतें उपभोक्ताओं तक पहुंचेंगी या नहीं, यह मांग की लोच और कंपनियों द्वारा इनपुट बदलने की क्षमता पर निर्भर करता है। जैसा कि भट्टाचार्य बताते हैं, इस असर का पूर्वानुमान लगाना बेहद कठिन है, जिसके कारण MPC को बहुत सावधानी से आगे बढ़ना पड़ रहा है।
नीति का रुख
तरलता (liquidity) और पूंजी प्रवाह को सहारा देने के लिए हाल ही में FCNR(B) और ECB (एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग) जैसे प्रोत्साहन उपाय पेश किए गए हैं। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि वित्तीय स्थितियां व्यापक आर्थिक स्थिरता के अनुकूल बनी रहें और रिकवरी की प्रक्रिया बाधित न हो। ब्याज दरों के चक्र को लेकर चल रही चर्चाओं के बावजूद, आंकड़े बताते हैं कि तरलता को उचित स्तर पर प्रबंधित किया जा रहा है। इससे बैंकिंग प्रणाली स्थिर बनी हुई है, जबकि MPC महंगाई के दबाव के पूरी तरह कम होने के स्पष्ट संकेतों का इंतजार कर रही है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
इसका मुख्य निष्कर्ष यह है कि RBI केवल हेडलाइन आंकड़ों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है। इनपुट लागत के संरचनात्मक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करके, MPC यह संकेत दे रही है कि वह तब तक ब्याज दरों में कटौती की जल्दबाजी नहीं करेगी जब तक कि उसे यह भरोसा न हो जाए कि कोर महंगाई का दबाव नियंत्रित हो गया है। आम निवेशक या व्यवसायी के लिए इसका मतलब यह है कि मौजूदा 'हायर-फॉर-लॉन्गर' (उच्च ब्याज दरें लंबे समय तक) का दौर तब तक जारी रहने की संभावना है जब तक आंकड़े यह पुष्टि न कर दें कि अर्थव्यवस्था बिना कीमतों में अस्थिरता पैदा किए नीतिगत बदलाव को संभाल सकती है।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।