नाजुक दौर: G7 शिखर सम्मेलन में कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
G7 शिखर सम्मेलन में विश्व नेताओं का मुख्य लक्ष्य 'अमेरिकी राष्ट्रपति को खुश रखना' है
जैसे-जैसे विश्व नेता कनाडा में जुट रहे हैं, उनका प्राथमिक उद्देश्य केवल नीतियों पर सहमति बनाना नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति को संतुष्ट रखने का नाजुक काम भी है।
इस साल कनाडा में हो रहे G7 शिखर सम्मेलन का माहौल भव्य भू-राजनीतिक रणनीतियों से ज्यादा 'मैनेजमेंट' के इर्द-गिर्द घूम रहा है। औपचारिक हैंडशेक की चमक-धमक के पीछे, वहां मौजूद नेताओं का अनकहा लक्ष्य साफ है: अमेरिकी राष्ट्रपति को खुश रखना। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और व्यापारिक घर्षण के बीच, यह शिखर सम्मेलन एक उच्च-स्तरीय संतुलन का खेल बन गया है, जहां कूटनीतिक सफलता इस बात से मापी जा रही है कि अमेरिकी प्रशासन को अलग-थलग करने के बजाय कैसे साथ बनाए रखा जाए।
एक नाजुक सहमति
यह चुनौती स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है। हालांकि नेता हालिया हमलों के बाद तनाव कम करने पर जोर दे रहे हैं, लेकिन उन्होंने इजरायल-ईरान संघर्ष में औपचारिक युद्धविराम की मांग करने से परहेज किया है। यह हिचकिचाहट उस 'नाजुक' संतुलन को बयां करती है जो एकजुट मोर्चा बनाए रखने के लिए जरूरी है। Politico और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ती चिंता को उजागर करती हैं, जो वाशिंगटन के अलग रुख के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र रूप से प्रयास कर रहे हैं।
यह घर्षण सुरक्षा से कहीं आगे तक फैला है। ग्रीनलैंड के तनाव से लेकर टैरिफ के व्यापक खतरों तक, G7 देशों को लग रहा है कि पारंपरिक गठबंधन अब विदेश नीति के सौदेबाजी वाले दृष्टिकोण से परखे जा रहे हैं। मेजबान के रूप में कनाडा खुद को एक बेहद अनिश्चित स्थिति में पा रहा है, जहां उसे अमेरिकी संरक्षणवादी एजेंडे और यूरोपीय समकक्षों के हितों के बीच की खाई को पाटने की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है।
भारत का नजरिया
भारत के लिए, G7 की बदलती गतिशीलता एक दिलचस्प स्थिति पैदा करती है। हालांकि नई दिल्ली इस समूह का सदस्य नहीं है, लेकिन इसके प्रभाव काफी महत्वपूर्ण हैं। मार्क कार्नी जैसी हस्तियों से जुड़ी हालिया चर्चाएं और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के प्रयास बताते हैं कि 'ग्लोबल साउथ' इस पर बारीकी से नजर रखे हुए है। यहां एक 'विन-विन' स्थिति की संभावना है—यदि भारत पश्चिमी देशों की एकता में आई इन दरारों का लाभ उठाकर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत कर सके, तो वह इन खंडित वार्ताओं में केवल एक दर्शक बने रहने के बजाय एक स्थिर कड़ी के रूप में उभर सकता है।
यह क्यों मायने रखता है
बड़ी तस्वीर यह है कि 'ग्रुप ऑफ सेवन' एक अनुमानित और एकीकृत गुट के रूप में अपनी पहचान खो रहा है। जब किसी शिखर सम्मेलन की मुख्य चिंता वैश्विक संकटों को हल करने के बजाय किसी एक राष्ट्राध्यक्ष के मिजाज को संभालना हो जाए, तो वैश्विक नीति को दिशा देने की उस संस्था की क्षमता कम हो जाती है। यह अब केवल व्यापार समझौतों या जलवायु प्रतिबद्धताओं के बारे में नहीं है; यह उस नियम-आधारित व्यवस्था के अस्तित्व के बारे में है जो वाशिंगटन के घरेलू राजनीतिक दबावों की दया पर निर्भर होती जा रही है। यदि नेता अमेरिकी राष्ट्रपति को संतुष्ट नहीं रख पाते हैं, तो यह शिखर सम्मेलन एक खोखली कवायद बनकर रह जाएगा, जिससे बाकी दुनिया इस अनिश्चित परिदृश्य में खुद को संभालने के लिए मजबूर हो जाएगी।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।