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मिडिल ईस्ट का नया मोड़: ट्रंप द्वारा कराए गए ईरान समझौते पर इजरायल का सीधा 'ना'

'हमें पाकिस्तानियों पर भरोसा नहीं', अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बीच इजराइली राजदूत रूवेन अजार का बड़ा बयान

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 16 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
मिडिल ईस्ट का नया मोड़: ट्रंप द्वारा कराए गए ईरान समझौते पर इजरायल का सीधा 'ना'
मिडिल ईस्ट का नया मोड़: ट्रंप द्वारा कराए गए ईरान समझौते पर इजरायल का सीधा 'ना'

जैसे ही वाशिंगटन होर्मुज जलडमरूमध्य में एक बड़ी सफलता का जश्न मना रहा है, इजरायल और पाकिस्तान के बीच एक तीखा राजनयिक गतिरोध क्षेत्रीय समीकरणों पर भारी पड़ता दिख रहा है।

पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक नक्शा रातों-रात बदल गया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच डोनाल्ड ट्रंप की सफल मध्यस्थता के परिणामस्वरूप एक ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ है, जिससे महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटने की उम्मीद है। जहां व्हाइट हाउस इसे एक ऐतिहासिक जीत बता रहा है—ऐसी उपलब्धि जो पिछले प्रशासन हासिल नहीं कर सके थे—वहीं यह जश्न हर जगह नहीं मनाया जा रहा है। नई दिल्ली में, इजराइली राजनयिक मिशन ने एक सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि इस समझौते में पाकिस्तान जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ी शामिल होते हैं, तो इससे स्थिरता आने की कोई संभावना नहीं है।

तनाव तब और बढ़ गया जब वाशिंगटन से ऐसे संकेत मिले कि इस्लामाबाद और तेल अवीव के बीच राजनयिक संबंध न होने के बावजूद, पाकिस्तान इस क्षेत्र में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने इस संभावना पर पूछे गए सवाल पर कोई लाग-लपेट नहीं रखी। एएनआई (ANI) से बात करते हुए अजार ने स्पष्ट रूप से कहा: "हमें पाकिस्तानियों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है।"

दुश्मनी का इतिहास

यह अविश्वास केवल राजनयिक दिखावा नहीं है; यह एक विशिष्ट और कड़वे इतिहास में निहित है। अप्रैल 2026 में रिश्ते तब और निचले स्तर पर पहुंच गए, जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सोशल मीडिया पर इजरायल को "कैंसर" और "मानवता के लिए अभिशाप" करार दिया। इजराइली सरकार के लिए, ऐसी बयानबाजी किसी भी बातचीत की शुरुआत के लिए ही बाधा है। राजदूत अजार ने इन यहूदी-विरोधी टिप्पणियों को मुख्य कारण बताया कि क्यों इजरायल-पाकिस्तान के बीच किसी भी तरह का सहयोग एक असंभव संभावना है।

यह राजनयिक घर्षण ईरान समझौते के इर्द-गिर्द बनी कहानी को जटिल बनाता है। हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना वैश्विक व्यापार के लिए एक रणनीतिक जीत है, लेकिन अन्य क्षेत्रीय अभिनेताओं को शामिल करना विवाद का विषय बना हुआ है। इजरायल का रुख मध्य-पूर्वी सुरक्षा में पाकिस्तान की भूमिका के प्रति गहरे संदेह को उजागर करता है, जिससे बाइडन-युग की राजनयिक विरासत एक मुश्किल स्थिति में आ गई है।

यह क्यों मायने रखता है: भू-राजनीतिक प्रभाव

यह केवल दो देशों के बीच जुबानी जंग का मामला नहीं है। बड़ी तस्वीर यह बताती है कि जहां अमेरिका मध्य पूर्व को स्थिर करने के लिए एक व्यापक क्षेत्रीय गठबंधन बनाने पर जोर दे रहा है, वहीं जमीनी हकीकत कहीं अधिक बिखरी हुई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जिनकी सरकार काल्पनिक क्षेत्रीय साझेदारियों के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता देती है, के लिए उन देशों को शामिल करना एक 'रेड लाइन' है जिनका रुख इजरायल के प्रति शत्रुतापूर्ण है।

एक आईआईएमसी (IIMC) पूर्व छात्र के रूप में, जिसने विदेश नीति की रिपोर्टिंग की बारीकियों को देखा है, यह स्पष्ट है कि इस तनाव का "मूल स्रोत" इस बुनियादी असहमति में है कि एक विश्वसनीय हितधारक कौन है। ट्रंप प्रशासन का विभिन्न खिलाड़ियों को एक मंच पर लाने का प्रयास क्षेत्रीय दुश्मनी की कठोर वास्तविकता से टकरा रहा है। फिलहाल, शांति समझौते की "मूल" भावना अमेरिका-ईरान गलियारे तक ही सीमित है, जबकि भारत जैसे देशों के लिए इसके व्यापक निहितार्थ—जो दोनों पक्षों के साथ संबंध संतुलित करता है—अनिश्चित बने हुए हैं। आने वाले सप्ताह यह बताएंगे कि क्या यह राजनयिक घर्षण एक अस्थायी बाधा है या नई क्षेत्रीय संरचना में कोई बुनियादी खामी।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।