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वक्त निकलता जा रहा है: भारत-अमेरिका ट्रेड पैक्ट के लिए 'सेक्शन 301' की समय-सीमा क्यों है अहम

अधिकारियों के मुताबिक, भारत-अमेरिका ट्रेड पैक्ट का पहला चरण सेक्शन 301 जांच पर टिका है

द्वारा फ़ीचर्स डेस्कप्रकाशित 8 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
वक्त निकलता जा रहा है: भारत-अमेरिका ट्रेड पैक्ट के लिए 'सेक्शन 301' की समय-सीमा क्यों है अहम
वक्त निकलता जा रहा है: भारत-अमेरिका ट्रेड पैक्ट के लिए 'सेक्शन 301' की समय-सीमा क्यों है अहम

जैसे-जैसे दिल्ली और वाशिंगटन एक अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं, श्रम और क्षमता से जुड़ी अमेरिका की एक जटिल जांच अंतिम बातचीत पर हावी होती दिख रही है।

नॉर्थ ब्लॉक के गलियारों में इस समय गहमागहमी का माहौल है। भारत एक उच्च-स्तरीय अमेरिकी टीम के दौरे की तैयारी कर रहा है—जिसका नेतृत्व संभवतः अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर करेंगे। बहुप्रतीक्षित भारत-अमेरिका ट्रेड पैक्ट को लेकर चर्चा अब एक तकनीकी बाधा पर सिमट गई है: सेक्शन 301 जांच।

पिछले कई हफ्तों से वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल संकेत दे रहे हैं कि दोनों देश जुलाई के मध्य तक समझौते के एक "बेहद जीवंत" पहले चरण के करीब पहुंच रहे हैं। हालांकि, इस समझौते की राह अमेरिकी प्रशासन के दोहरे रुख के कारण जटिल हो गई है। मार्च में, USTR ने आपूर्ति श्रृंखलाओं में जबरन श्रम और अतिरिक्त विनिर्माण क्षमता पर चिंताओं का हवाला देते हुए भारत सहित कई देशों के खिलाफ जांच शुरू की थी।

दांव पर बहुत कुछ लगा है। अमेरिका ने फिलहाल 10% का अस्थायी शुल्क लगाया है, जो 24 जुलाई को समाप्त होने वाला है। इस तारीख के बाद, उम्मीद है कि अमेरिका 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) टैरिफ पर वापस लौट आएगा, जब तक कि नई शर्तें तय नहीं हो जातीं। यदि वाशिंगटन अतिरिक्त शुल्क लगाने का इरादा रखता है—जैसे कि जबरन श्रम जांच से जुड़ा प्रस्तावित 12.5% टैरिफ—तो सेक्शन 301 की प्रक्रिया को जुलाई की समय-सीमा से पहले पूरा करना होगा। एक अधिकारी ने पुष्टि की है कि भारत बेहतर शर्तों के लिए जोर दे रहा है, ताकि बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले बढ़त हासिल की जा सके।

भारत-यूके समानांतर स्थिति

जहां अमेरिका के साथ व्यापार पर ध्यान केंद्रित है, वहीं भारत-यूके गलियारे में भी काम अपनी गति से चल रहा है। जुलाई 2025 में हस्ताक्षरित 'कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट' (CETA) पर अभी भी काम जारी है। हालांकि तीन मुख्य अड़चनों में से एक को सुलझा लिया गया है, लेकिन स्टील सेफगार्ड उपाय और यूके का 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' अभी भी चर्चा का मुख्य विषय बने हुए हैं। अधिकारियों का कहना है कि प्रगति "अच्छी" है, लेकिन लंदन में मंत्रिस्तरीय दौरा आगामी संयुक्त आर्थिक और व्यापार समिति की बैठक के दौरान बाकी मुद्दों को सुलझाने पर निर्भर है।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है

इन दो व्यापार वार्ताओं का संगम वैश्विक वाणिज्य के प्रति भारत के बदलते दृष्टिकोण को दर्शाता है: अब भारत व्यापक, दशकों पुराने ढांचे से हटकर चुस्त और चरणबद्ध समझौतों की ओर बढ़ रहा है। सेक्शन 301 के परिणाम पर निर्भरता यह दिखाती है कि भारत अब केवल बाजार तक पहुंच नहीं चाह रहा है, बल्कि वह अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों के नियामक "रेड टेप" (लालफीताशाही) को भी सक्रिय रूप से पार कर रहा है। यदि भारत-अमेरिका का पहला चरण सफल होता है, तो यह एक ब्लूप्रिंट के रूप में काम करेगा कि कैसे नई दिल्ली अपनी घरेलू विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं को पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा लागू किए जा रहे कड़े श्रम और पर्यावरणीय मानकों के साथ संतुलित करना चाहती है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि क्या यह व्यावहारिक कूटनीति घरेलू चुनावी चक्रों और वैश्विक संरक्षणवादी रुझानों के दबाव को झेल पाएगी।

द्वारा फ़ीचर्स डेस्क
संस्कृति, तकनीक और जीवन

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