कर्नाटक विधान परिषद चुनाव: क्रॉस-वोटिंग से BJP को बड़ा झटका, कांग्रेस ने पांच सीटों पर किया कब्जा
कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में BJP के लिए बड़ा झटका: CM डीके शिवकुमार की बड़ी जीत, क्रॉस-वोटिंग ने पार्टी की अंदरूनी कलह को उजागर किया

विधान परिषद चुनावों के नतीजों ने बीजेपी को आंतरिक असंतोष से जूझने पर मजबूर कर दिया है, जबकि कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन राज्य में उसकी बढ़ती ताकत को दर्शाता है।
कर्नाटक विधान परिषद चुनावों के नाटकीय घटनाक्रम के बाद बेंगलुरु का राजनीतिक पारा चढ़ गया है। नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी एक मजबूत जनादेश के साथ उभरी है, जिसने सात में से पांच सीटों पर जीत हासिल की है। सत्ताधारी पार्टी के लिए यह जीत केवल विधायी सफलता नहीं, बल्कि अपना दबदबा साबित करने जैसा है। वहीं, विपक्ष के लिए ये नतीजे एक तत्काल आंतरिक संकट लेकर आए हैं, जहां क्रॉस-वोटिंग के आरोपों ने बीजेपी की राज्य इकाई के भीतर गहरी दरारों को उजागर कर दिया है।
आंकड़े एकतरफा बढ़त की कहानी बयां कर रहे हैं। कांग्रेस उम्मीदवार विनय कार्तिक, तिप्पन्नाप्पा कामाकनूर, बीएस शिवन्ना, बीके हरिप्रसाद और पीवी मोहन ने जीत हासिल की, जिसमें कार्तिक 32 वोट पाकर सबसे आगे रहे। दूसरी ओर, बीजेपी दो सीटें—रघु कौटिल्य और लिंगराज पाटिल—बचाने में कामयाब रही, लेकिन यह प्रक्रिया काफी मुश्किल भरी रही। पाटिल को जीत के लिए दूसरी वरीयता के वोटों पर निर्भर रहना पड़ा, जबकि जनता दल (सेक्युलर) के उम्मीदवार गोविंद राजू केवल 14 वोटों पर सिमट गए।
आंतरिक कलह उजागर
इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू सीटों की संख्या नहीं, बल्कि मतगणना के दौरान बीजेपी को लगा 'झटका' है। विपक्ष के नेता आर. अशोक ने मीडिया से बात करते हुए साफ तौर पर स्वीकार किया कि पार्टी के अपने ही सदस्यों ने व्हिप का उल्लंघन किया है। क्रॉस-वोटिंग की बात और बीजेपी का एक वोट अमान्य घोषित होने से पार्टी के संगठनात्मक अनुशासन पर सवाल खड़े हो गए हैं।
अशोक ने कहा, "हम निश्चित रूप से पता लगाएंगे कि किसने क्रॉस-वोटिंग की और पार्टी के साथ विश्वासघात किया है।" उन्होंने पुष्टि की कि आलाकमान अब असंतुष्टों की तलाश कर रहा है। विश्वासघात की यह सार्वजनिक स्वीकारोक्ति दर्शाती है कि पार्टी की आंतरिक एकता भारी दबाव में है, और इसका परिणाम उन लोगों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में सामने आएगा जिन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान किया।
यह क्यों मायने रखता है
यह परिणाम राज्य के राजनीतिक संतुलन के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। जब बीजेपी जैसी अनुशासित पार्टी में आंतरिक सेंधमारी होती है, तो यह अक्सर गहरे असंतोष या नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच के फासले को दर्शाता है। सीएम डीके शिवकुमार के लिए, यह 'बड़ी जीत' कांग्रेस के भीतर अपना प्रभाव मजबूत करने और राज्य विधानसभा में स्थिरता पेश करने के लिए जरूरी राजनीतिक पूंजी प्रदान करती है।
बड़ी तस्वीर यह है कि हाई-प्रोफाइल परिषद चुनावों में पार्टी की निष्ठा कितनी नाजुक होती है। हालांकि इन चुनावों को अक्सर आम चुनावों से कमतर आंका जाता है, लेकिन ये पार्टी की वफादारी और प्रबंधन की प्रभावशीलता के लिए लिटमस टेस्ट की तरह काम करते हैं। अपने घर को व्यवस्थित रखने में विफल रहने के कारण, बीजेपी ने कांग्रेस को एक सामान्य चुनाव को अपनी अव्यवस्था की कहानी में बदलने का मौका दे दिया है। जैसे-जैसे राज्य अगले विधायी चक्र की ओर बढ़ रहा है, बीजेपी के सामने मुख्य चुनौती इन बढ़ती दरारों को पाटने की होगी, इससे पहले कि वे एक शर्मनाक घटना से बदलकर एक बड़ी चुनावी मुसीबत बन जाएं।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।