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कर्नाटक विधान परिषद चुनाव: बागी विधायकों के लिए 'अग्निपरीक्षा'

यत्नाल, सोमशेखर और हेब्बार पर टिकी निगाहें; क्या परिषद चुनाव में कांग्रेस या जेडीएस को मिलेगा इनका साथ?

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 19 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
कर्नाटक विधान परिषद चुनाव: बागी विधायकों के लिए 'अग्निपरीक्षा'
कर्नाटक विधान परिषद चुनाव: बागी विधायकों के लिए 'अग्निपरीक्षा'

जैसे-जैसे राज्य विधान परिषद चुनाव की ओर बढ़ रहा है, भाजपा के तीन प्रमुख नेताओं का वोटिंग पैटर्न राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है।

बेंगलुरु की सत्ता के गलियारों में आगामी विधान परिषद चुनाव को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। सात सीटों के लिए आठ उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा हो गया है। जहां सत्तारूढ़ कांग्रेस अपने पांचवें उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है, वहीं जेडीएस पर्दे के पीछे से अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा के उन तीन विधायकों पर सबकी नजरें टिकी हैं, जिन्होंने हाल के दिनों में पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाकर सबको चौंकाया है।

बसनगौड़ा पाटिल यत्नाल, एस.टी. सोमशेखर और शिवराम हेब्बार इस चुनावी ड्रामे के केंद्र में हैं। इन तीनों नेताओं के भाजपा के राज्य नेतृत्व के साथ संबंध कुछ समय से तनावपूर्ण रहे हैं, और वे अक्सर अपनी असहमति जताते रहे हैं। चूंकि इन विधायकों का अगला कदम अभी स्पष्ट नहीं है, इसलिए कांग्रेस और जेडीएस दोनों ही विपक्ष में किसी भी संभावित दरार का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।

संख्या बल का खेल

कर्नाटक के इस चुनाव का गणित बेहद पेचीदा है। इस मुकाबले में एक-एक वोट की कीमत है और गलती की कोई गुंजाइश नहीं है। यदि कांग्रेस अपने पांचवें उम्मीदवार को जिताने में सफल रहती है, तो यह उसकी एक बड़ी रणनीतिक जीत होगी, जो विधानसभा में उसकी मजबूती को दर्शाएगी। इसके विपरीत, जेडीएस अपनी आंतरिक रणनीति पर भरोसा कर रही है ताकि उसका उम्मीदवार जीत सके, जबकि भाजपा को अपने बागी सदस्यों की अनिश्चितता से जूझना पड़ रहा है।

सोमशेखर और यत्नाल को लेकर बनी अनिश्चितता केवल अफवाह नहीं है; यह राज्य की राजनीति में चल रही गहरी हलचल को दर्शाती है। इन विधायकों का अपना प्रभाव है और पार्टी व्हिप की नजरें उन पर टिकी हैं। मतदान की तारीख नजदीक आते ही सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे पार्टी के निर्देशों का पालन करेंगे या 'अंतरात्मा की आवाज' पर वोट देंगे।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह मुकाबला केवल उच्च सदन की सात सीटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह राज्य में पार्टी अनुशासन का लिटमस टेस्ट भी है। यदि भाजपा परिषद चुनाव जैसी प्राथमिक प्रक्रिया में भी अपने विधायकों को एकजुट नहीं रख पाती है, तो यह पार्टी के नेतृत्व पर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस के लिए, इस चुनाव में सफलता सरकार का आत्मविश्वास बढ़ाएगी, जबकि जेडीएस के लिए अपने उम्मीदवार को जिताना राज्य की राजनीति में 'किंगमेकर' की भूमिका बनाए रखने के लिए जरूरी है।

इस चुनाव का परिणाम आने वाले महीनों की दिशा तय करेगा कि राज्य विधानसभा का सत्र सहयोगपूर्ण होगा या टकराव से भरा। जैसे-जैसे मतदान का समय नजदीक आ रहा है, सबकी नजरें इसी बात पर टिकी हैं कि क्या ये तीनों विधायक अपनी पार्टी के साथ खड़े रहेंगे या कर्नाटक विधानसभा की बदलती राजनीति में कोई नया खेल करेंगे।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।