न्याय का लंबा इंतजार: इलाहाबाद हाईकोर्ट में 40 साल बाद भी फैसला नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट को हत्या के मामले में दोषसिद्धि की अपील पर फैसला लेने में लगे 4 दशक

सुप्रीम कोर्ट ने यह जानकर गहरी निराशा व्यक्त की है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में हत्या के एक मामले की अपील चार दशकों से लंबित थी, जिससे आरोपी कानूनी अनिश्चितता के बीच फंसा रहा।
भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में न्याय की गति बेहद धीमी है। इस सप्ताह, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले पर संज्ञान लिया जो न्यायिक बैकलॉग का एक दुखद प्रतीक बन गया है: नवंबर 1983 में हत्या के आरोप में 28 साल की उम्र में गिरफ्तार किए गए एक व्यक्ति की आजीवन कारावास के खिलाफ अपील अब जाकर सुनवाई के एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपनी किस्मत का फैसला होने के इंतजार में 40 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद, देरी के इस स्तर ने जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एएस चंडुरकर की बेंच को स्पष्ट रूप से परेशान कर दिया है।
संबंधित व्यक्ति के लिए, यह कानूनी सफर अनिश्चितता की एक लंबी मैराथन रहा है। हालांकि वह शुरुआत में केवल तीन महीने जेल में रहा, लेकिन जमानत पर रहते हुए वह 43 वर्षों तक लंबित दोषसिद्धि के साये में जी रहा है। हाईकोर्ट को केवल शुरुआती अपील को प्रोसेस करने में 41 साल लग गए। जब मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो न्यायाधीशों को एक ऐसी व्यवस्थागत विफलता से जूझना पड़ा, जहां याचिकाओं की पेंडेंसी इतनी अधिक हो गई है कि इसने न्याय की प्रक्रिया को पूरी तरह से बाधित कर दिया है।
समाधान की तलाश
सुनवाई के दौरान, जस्टिस मिश्रा ने सिस्टम की बाधाओं को दूर करने के लिए समाधान पर जोर दिया। सुझाव कड़े थे: याचिकाकर्ता के वकील ने तीन दशकों से लंबित सभी अभियोजन अपीलों को खारिज करने का प्रस्ताव रखा। हालांकि, बेंच ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि न्याय के बुनियादी सिद्धांत इस तरह के एकतरफा दृष्टिकोण की अनुमति नहीं देते। उन्होंने चेतावनी दी कि केवल लंबी पेंडेंसी के कारण मामलों को खारिज करना सार्वजनिक हित को नुकसान पहुंचा सकता है, और जोर दिया कि राज्य को अदालत में अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए।
यह मामला कोई इकलौती घटना नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में हाल ही में लंबे समय से लंबित कई मामले निष्कर्ष तक पहुंचे हैं, जिनमें से कई में प्रतिवादी अब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं—कुछ की उम्र 100 साल तक है। दशकों पुराने हत्या के मामलों में बरी होने से लेकर 1980 के दशक के पुलिस आचरण की जांच तक, कोर्ट की फाइलें बीते युग की यादों से भरी पड़ी हैं।
बड़ी तस्वीर
यह व्यवस्थागत सुस्ती 'न्याय में देरी, न्याय से इनकार' जैसी स्थिति पैदा करती है, जो आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। जब कोई अदालत हत्या की दोषसिद्धि तय करने में चार दशक लेती है, तो वह आरोपी और पीड़ित दोनों के साथ विफल होती है। आरोपी निरंतर चिंता में जीता है, जबकि पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता। उम्रदराज प्रतिवादियों का पैटर्न—जिनमें से कुछ फैसले के इंतजार में अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके हैं—बताता है कि मौजूदा बुनियादी ढांचा अपने ही बोझ तले दब रहा है। जब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट क्रांतिकारी प्रक्रियात्मक सुधार लागू नहीं करता या अधिक कुशल केस प्रबंधन की ओर नहीं बढ़ता, तब तक ये 'विरासत के मामले' सामने आते रहेंगे, जो यह याद दिलाते रहेंगे कि न्यायपालिका उन लोगों के जीवनकाल के साथ तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रही है जिनका वह फैसला करती है।
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