फिनलैंड से दिल्ली तक: रूसी तेल पर यूरोपीय आलोचनाओं का विदेश मंत्री जयशंकर ने दिया करारा जवाब
'यूरोपीय देश भारत पर हमले में इस्तेमाल होने वाले हथियार बेचते हैं': रूसी तेल पर भारत का रुख साफ किया
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूरोपीय आलोचकों को करारा जवाब देते हुए पश्चिमी देशों के उपदेशों के पीछे छिपे विरोधाभास को उजागर किया है, जबकि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है।
यूक्रेन संघर्ष को लेकर नई दिल्ली और विभिन्न यूरोपीय राजधानियों के बीच चल रही कूटनीतिक तनातनी फिनलैंड में 'कुलतारंता टॉक्स' (Kultaranta Talks) के दौरान तीखी बहस में बदल गई। अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाने वाले एस जयशंकर ने इस नैरेटिव को पूरी तरह खारिज कर दिया कि भारत रूस के प्रति "बहुत सहानुभूति" रख रहा है। उन्होंने एक कड़वा ऐतिहासिक सच सामने रखा: दशकों से यूरोपीय देशों द्वारा भारत के पड़ोसियों को बेचे गए हथियारों का इस्तेमाल भारत पर हमले के लिए किया गया है।
विदेश मंत्री की यह टिप्पणी भारत के ऊर्जा आयात पर लगातार उठ रहे सवालों का एक सटीक जवाब थी। जब यूरोपीय अधिकारियों ने बार-बार यह सवाल उठाया कि नई दिल्ली रूसी तेल क्यों खरीद रही है, तो जयशंकर ने पासा पलट दिया। उन्होंने मंच से कहा, "किसी भी यूरोपीय देश पर भारतीय हथियारों से हमला नहीं किया गया है। काश मैं भारत के संदर्भ में यूरोप के हथियारों के लिए भी यही कह पाता।" उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के खरीद निर्णय भू-राजनीतिक गठबंधन के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से प्रेरित हैं।
ऊर्जा संतुलन का खेल
पर्दे के पीछे की स्थिति सार्वजनिक बयानों से कहीं अधिक जटिल है। सूत्रों का कहना है कि मॉस्को से कच्चा तेल खरीदने का भारत का फैसला कोई मनमाना कदम नहीं था। 2022 में, जब वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रतिबंधों के शुरुआती झटके से जूझ रहे थे, तब अमेरिका ने वास्तव में भारत को रूसी आपूर्ति जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया था, ताकि कीमतों में उस विनाशकारी उछाल को रोका जा सके जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया होता।
भारत के लिए, यह गणित बहुत सरल है। एक बड़े ऊर्जा आयातक के रूप में, दिल्ली को महंगाई को नियंत्रित रखने और घरेलू उद्योगों को चालू रखने के लिए सबसे बेहतर सौदे की जरूरत है। जयशंकर ने लगातार यह रुख बनाए रखा है कि भारत वहीं व्यापार करेगा जहां उसे सबसे अच्छी शर्तें मिलेंगी, चाहे पश्चिमी राजधानियों से कितनी भी आलोचना क्यों न हो।
यह क्यों मायने रखता है
यह घर्षण 'रणनीतिक स्वायत्तता' (strategic autonomy) को देखने के नजरिए में बढ़ते अंतर को उजागर करता है। यूरोप यूक्रेन संकट को अपने अस्तित्व के संकट के रूप में देखता है और वैश्विक एकजुटता की उम्मीद करता है। हालांकि, भारत इस संघर्ष को उन कई भू-राजनीतिक दबावों में से एक मानता है जिन्हें उसे संतुलित करना है।
बड़ी तस्वीर वैश्विक शक्ति गतिशीलता में बदलाव की है। यूरोपीय हथियारों की बिक्री के विरोधाभास को सार्वजनिक रूप से उजागर करके, जयशंकर यह संकेत दे रहे हैं कि भारत द्वारा पश्चिम के नैतिक उपदेशों को स्वीकार करने का दौर खत्म हो गया है। नई दिल्ली अब अपनी विदेश नीति को अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करने में सहज है और वह किसी और के भू-राजनीतिक एजेंडे का मूक भागीदार बनने को तैयार नहीं है। ब्रसेल्स और दिल्ली के लिए अब चुनौती यह है कि वे इन सार्वजनिक विवादों से आगे बढ़ें और एक ऐसा मध्यम मार्ग खोजें जो भारत की अर्थव्यवस्था को बनाए रखने की आवश्यकता का सम्मान करे और साथ ही यूरोपीय सुरक्षा चिंताओं को भी संबोधित करे।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।