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नौकरशाही की सुस्ती और अदालत की सख्ती: सुप्रीम कोर्ट ने CARA से गोद लेने की प्रक्रिया में देरी पर मांगा जवाब

“आपकी समस्या क्या है?” सुप्रीम कोर्ट ने गोद लेने वाली संस्था CARA को देरी के लिए फटकारा

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 24 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
नौकरशाही की सुस्ती और अदालत की सख्ती: सुप्रीम कोर्ट ने CARA से गोद लेने की प्रक्रिया में देरी पर मांगा जवाब
नौकरशाही की सुस्ती और अदालत की सख्ती: सुप्रीम कोर्ट ने CARA से गोद लेने की प्रक्रिया में देरी पर मांगा जवाब

सर्वोच्च न्यायालय ने देश की नोडल एडॉप्शन एजेंसी को कड़ी फटकार लगाते हुए उन प्रणालीगत बाधाओं के लिए जवाबदेही तय करने को कहा है, जिनकी वजह से बच्चे संस्थागत देखभाल में रहने को मजबूर हैं।

सुप्रीम कोर्ट के हालिया हस्तक्षेप ने भावी माता-पिता के बीच लंबे समय से पनप रहे गुस्से को सामने ला दिया है। कोर्ट ने सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान, जजों ने तीखे लहजे में पूछा, "आपकी समस्या क्या है?"—यह सवाल एजेंसी की सुस्त कार्यप्रणाली के प्रति बढ़ती नाराजगी को दर्शाता है। जो परिवार बच्चे को घर लाने की जटिल प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, उनके लिए सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उन उम्मीदों की आवाज है जो लालफीताशाही के कारण दम तोड़ रही थीं।

सिस्टम में फंसी गाड़ी

मामले की जड़ यह है कि जिस संस्था का काम कानूनी रूप से गोद लेने की प्रक्रिया को आसान बनाना है, वह खुद एक बाधा बन गई है। कोर्ट ने यह सवाल उठाकर कि एजेंसी अपनी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने में क्यों विफल रही है, सार्वजनिक संस्थानों की एक बड़ी कमी को उजागर किया है: नीति के इरादे और जमीनी स्तर पर उसके क्रियान्वयन के बीच का अंतर। हालांकि CARA का उद्देश्य बच्चे का कल्याण और गोद लेने की प्रक्रिया की अखंडता सुनिश्चित करना है, लेकिन कोर्ट के तीखे सवालों से संकेत मिलता है कि सुरक्षा उपाय अब अनावश्यक बाधाओं में बदल गए हैं, जिससे परिवारों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।

यह केवल प्रशासनिक अक्षमता का मामला नहीं है; यह उन बच्चों के जीवन का सवाल है जो एक स्थायी घर का इंतजार कर रहे हैं। जब देश की सर्वोच्च अदालत हस्तक्षेप करती है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि शासन की मशीनरी अपने प्राथमिक उद्देश्य को पूरा करने में विफल हो रही है। अदालत में हुई यह सीधी बातचीत कि "आपकी समस्या क्या है", एक चेतावनी है कि न्यायपालिका अब प्रक्रियात्मक बहाने स्वीकार करने को तैयार नहीं है, खासकर तब जब परिवार के साथ रहने के मौलिक अधिकार का सवाल हो।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है

इसका व्यापक अर्थ यह है कि अब एक अधिक संवेदनशील, तकनीक-सक्षम और पारदर्शी एडॉप्शन फ्रेमवर्क की तत्काल आवश्यकता है। वर्षों से विशेषज्ञ तर्क देते रहे हैं कि वर्तमान प्रणाली बहुत अधिक मैनुअल निगरानी और पुराने प्रोटोकॉल पर निर्भर है, जो गति के बजाय पदानुक्रम को प्राथमिकता देते हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती एक बहुत जरूरी बदलाव का उत्प्रेरक बन सकती है। यदि सरकार CARA के भीतर की संरचनात्मक समस्याओं को हल करने में विफल रहती है, तो इससे राज्य द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण पहलों पर जनता का भरोसा और कम हो जाएगा। एक सरल और सुव्यवस्थित प्रक्रिया केवल सुविधा का मामला नहीं है; यह उस देश के लिए एक नैतिक अनिवार्यता है जो अपने सबसे कमजोर नागरिकों की भलाई को प्राथमिकता देने पर गर्व करता है।

आगे बढ़ते हुए, अब ध्यान इस बात पर होगा कि क्या एजेंसी बदलाव के लिए कोई ठोस रोडमैप पेश कर सकती है। न्यायिक दबाव के कारण CARA को अपने कामकाज का आंतरिक ऑडिट करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे नियमों की व्याख्या करने के तरीके में बदलाव आ सकता है। फिलहाल, पूरी नजर एजेंसी पर है, और हजारों माता-पिता के लिए, कोर्ट का यह हस्तक्षेप उम्मीद की एक किरण है कि गोद लेने का रास्ता अब सिस्टम के खिलाफ लड़ाई जैसा नहीं रहेगा।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।