प्रयोगशाला से परे: AI के दौर में कैसे बदल रही है भौतिकी की परिभाषा
AI के युग में फिजिक्स में करियर कैसे बनाएं? TIFR के प्रोफेसर ने बताया

TIFR के डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर जी. रवींद्र कुमार का तर्क है कि उभरती हुई तकनीक भारतीय वैज्ञानिकों की अगली पीढ़ी के लिए खतरा नहीं, बल्कि एक सहयोगी है।
AI के दौर में भौतिकी में करियर बनाने की दहलीज पर खड़े छात्रों के मन में एक ही चिंता है: क्या एल्गोरिदम मानवीय अंतर्ज्ञान (human intuition) को बेकार कर देंगे? मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) का नज़रिया इसके बिल्कुल विपरीत है। संस्थान के डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर जी. रवींद्र कुमार ने हाल ही में IIT मद्रास के प्रोफेसर महेश पंचग्नूला के साथ इस बदलाव को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस विषय का भविष्य मशीनों से मुकाबला करने में नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने और अभूतपूर्व स्तर पर डेटा को अनलॉक करने में है।
अनुसंधान की नई सीमा
पॉडकास्ट के दौरान, TIFR के प्रोफेसर ने समझाया कि छात्रों की वर्तमान पीढ़ी को उस डर से बाहर निकलना चाहिए जो अक्सर इस विषय के साथ जुड़ा होता है। इसके बजाय, उन्होंने जोर दिया कि AI के युग में भौतिकी में करियर बनाने के लिए मजबूत बुनियादी सिद्धांतों के साथ-साथ उभरते हुए उपकरणों के प्रति जिज्ञासा जरूरी है।
भौतिकी वर्तमान में 'डेटा की बाढ़' का सामना कर रही है, विशेष रूप से पार्टिकल फिजिक्स और खगोल विज्ञान जैसे क्षेत्रों में। जहां पहले मानव शोधकर्ता डेटा की भारी मात्रा के कारण सीमित थे, वहीं अब AI एक 'फोर्स मल्टीप्लायर' के रूप में काम कर रहा है। प्रोफेसर कुमार ने बताया कि ये उपकरण प्रयोगशाला की जटिल प्रणालियों को सक्रिय रूप से अनुकूलित कर रहे हैं, जिससे भौतिक विज्ञानी एक दशक पहले की तुलना में कहीं अधिक सटीकता के साथ शोध कर पा रहे हैं।
एक व्यावहारिक अनुप्रयोग: डेटा से इलाज तक
इस बदलाव का असर अब सैद्धांतिक मॉडलों से निकलकर जीवन रक्षक प्रयोगों तक पहुंच रहा है। प्रोफेसर ने TIFR और यूके के शोधकर्ताओं के बीच एक महत्वपूर्ण सहयोग पर प्रकाश डाला, जिसमें मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल के दशकों पुराने डेटा का उपयोग किया गया। कैंसर ऊतक पैटर्न पर मॉडलों को प्रशिक्षित करके, वैज्ञानिक अब कैंसर कोशिकाओं की गति का सटीक अनुमान लगाने में सक्षम हैं। यही आधुनिक भौतिकी की व्यावहारिक वास्तविकता है: कंप्यूटेशनल शक्ति का उपयोग करके बीमारियों की पहचान करना और उनका इलाज करना, इससे पहले कि वे लाइलाज हो जाएं।
बड़ी तस्वीर
वैज्ञानिक पद्धति में यह विकास भारतीय शैक्षणिक परिदृश्य में एक बदलाव का संकेत देता है। दशकों तक, भौतिकी में करियर को अकेले किए जाने वाले काम या केवल प्रयोगों के आधार पर परिभाषित किया जाता था। अब, पाठ्यक्रम स्वाभाविक रूप से अंतःविषय सहयोग (interdisciplinary collaboration) की ओर बढ़ रहा है। यदि TIFR का मॉडल कोई संकेत है, तो स्नातकों की अगली पीढ़ी क्वांटम मैकेनिक्स जितनी ही सहजता से डेटा साइंस का उपयोग करेगी। नीति निर्माताओं और शैक्षणिक संस्थानों के लिए संदेश स्पष्ट है: ध्यान पारंपरिक रटने की पद्धति से हटकर कंप्यूटेशनल साक्षरता पर होना चाहिए, ताकि भारत का शोध आउटपुट चिकित्सा और खगोल भौतिकी जैसे क्षेत्रों में अग्रणी बना रहे।
क्या जरूरी है?
अंत में, TIFR के प्रोफेसर ने समझाया कि एक भौतिक विज्ञानी को प्रेरित करने वाली मौलिक जिज्ञासा आज भी वही है। हालांकि काम करने के उपकरण बदल रहे हैं, लेकिन गहरी और कठोर सोच की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। जो छात्र मजबूत नींव बनाने पर ध्यान केंद्रित करेंगे, वे पाएंगे कि AI उनकी जगह नहीं ले रहा है; यह केवल कठिन और उबाऊ काम को आसान बना रहा है, जिससे वे उन खोजों पर ध्यान केंद्रित कर सकें जो वास्तव में मायने रखती हैं।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।