Politicalpedia
बिज़नेस

ग्लोबल मार्केट में अस्थिरता: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में क्यों आ रही है भारी गिरावट?

आरबीआई के खजाने में तेज गिरावट, पिछले सप्ताह आई 54000 करोड़ की कमी, जाने कहां खर्च करना पड़ा पैसा

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 4 जुलाई 2026· 3 मिनट पढ़ें
ग्लोबल मार्केट में अस्थिरता: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में क्यों आ रही है भारी गिरावट?
ग्लोबल मार्केट में अस्थिरता: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में क्यों आ रही है भारी गिरावट?

जैसे-जैसे भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक दबाव बढ़ रहे हैं, देश के विदेशी मुद्रा भंडार में साप्ताहिक गिरावट के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की हस्तक्षेप रणनीतियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती लंबे समय से देश की आर्थिक स्थिरता का आधार रही है, फिर भी हाल के हफ्तों में इसमें भारी अस्थिरता देखी गई है। इस साल की शुरुआत में 728 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंचने के बाद, भंडार में कई बार तेज गिरावट आई है। कुछ हफ्तों में तो 9 अरब डॉलर यानी करीब 82,000 करोड़ रुपये से अधिक की निकासी देखी गई है। ये उतार-चढ़ाव उस नाजुक संतुलन को दर्शाते हैं जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता और व्यापार शुल्क के झटकों से रुपये को बचाने के लिए स्पॉट मार्केट में हस्तक्षेप करके बनाए रखता है।

स्थिरता की कीमत

इन उतार-चढ़ावों के पीछे केवल बाजार की ताकतें ही नहीं हैं, बल्कि रुपये को गिरने से बचाने में आरबीआई की सक्रिय भूमिका भी है। खुले बाजार में डॉलर बेचकर, केंद्रीय बैंक का लक्ष्य तरलता प्रदान करना और अत्यधिक अस्थिरता को कम करना है। हालांकि यह रणनीति अल्पावधि में भंडार को कम करती है, लेकिन यह पश्चिमी एशिया में चल रहे संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों के दबाव जैसे बाहरी झटकों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच का काम करती है। जैसा कि news18 की रिपोर्टों में उल्लेख किया गया है, आरबीआई इस बात पर कायम है कि वह किसी विशिष्ट विनिमय दर को लक्षित नहीं करता है, बल्कि केवल तभी हस्तक्षेप करता है जब बाजार की अस्थिरता आवश्यक आयात-निर्यात चक्रों को बाधित करने की धमकी देती है।

दोधारी तलवार

वित्तीय स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब हम गैर-डॉलर संपत्तियों के मूल्यांकन को देखते हैं। चूंकि भंडार में यूरो, पाउंड और येन जैसी मुद्राओं की एक टोकरी शामिल है, इसलिए अमेरिकी डॉलर सूचकांक के मजबूत होने से अक्सर डॉलर के संदर्भ में कुल मूल्यांकन कम दिखाई देता है। इसके अलावा, सोने के भंडार—जो कि एक पारंपरिक सुरक्षित निवेश माना जाता है—के मूल्यांकन में भी बदलाव आया है, जिससे कुल गिरावट में योगदान मिला है। हालांकि कुछ पर्यवेक्षक इसे संकट के संकेत के रूप में देखते हैं, लेकिन news18hindi और अन्य स्रोत सामग्रियों के आंकड़े बताते हैं कि ये गतिविधियां अक्सर राष्ट्रीय धन की कमी के बजाय सोची-समझी रणनीतिक हस्तक्षेप का परिणाम होती हैं।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है

यह केवल बैलेंस शीट का मामला नहीं है; यह विदेशी निवेशकों के 'रुको और देखो' वाले वैश्विक दृष्टिकोण के खिलाफ भारत के लचीलेपन के बारे में है। जब आरबीआई रुपये की रक्षा के लिए अरबों खर्च करता है, तो यह बाजार पर नियंत्रण का स्पष्ट संकेत देता है, लेकिन यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और भू-राजनीतिक तनावों के प्रति उभरते बाजारों की संवेदनशीलता को भी उजागर करता है। यह तथ्य कि आरबीआई ने रिकॉर्ड अधिशेष अर्जित किया है—सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये से अधिक हस्तांतरित किए हैं—यह साबित करता है कि बाजार के संकट के दौरान डॉलर बेचना महंगा जरूर है, लेकिन केंद्रीय बैंक का समग्र खजाना प्रबंधन मजबूत बना हुआ है।

आगे की राह

आगे का रास्ता वैश्विक व्यापार गतिशीलता से जुड़ा हुआ है। 'ट्रंप टैरिफ' की छाया और चल रहे क्षेत्रीय संघर्षों के साथ, रुपये पर दबाव रातों-रात खत्म होने की संभावना नहीं है। आरबीआई की कार्यप्रणाली—शांति के समय में खरीदारी करना और उच्च अस्थिरता के दौरान डॉलर बेचना—व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्राथमिक उपकरण बनी रहेगी। आम नागरिक के लिए, हालांकि खजाने से अरबों डॉलर बाहर जाने की ये सुर्खियां चिंता पैदा कर सकती हैं, लेकिन ये काफी हद तक एक अत्यधिक अप्रत्याशित वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिर मुद्रा बनाए रखने की लागत हैं।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।