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तृणमूल कांग्रेस में घमासान: आंतरिक बगावत से ममता बनर्जी की संसदीय ताकत पर संकट

TMC सांसद संकट: जून मालिया, देव, सायनी घोष और रचना बनर्जी समेत कई सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 11 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
तृणमूल कांग्रेस में घमासान: आंतरिक बगावत से ममता बनर्जी की संसदीय ताकत पर संकट
तृणमूल कांग्रेस में घमासान: आंतरिक बगावत से ममता बनर्जी की संसदीय ताकत पर संकट

टीएमसी की कतारों में हाई-प्रोफाइल इस्तीफों और बढ़ते असंतोष की लहर दिल्ली में पार्टी नेतृत्व के लिए एक गहरे अस्तित्वगत संकट का संकेत दे रही है।

राष्ट्रीय राजधानी के सत्ता के गलियारों में अटकलें तेज हैं क्योंकि TMC सांसद संकट एक ऐसी दरार को उजागर कर रहा है जो महज राजनीतिक असहमति से कहीं आगे की है। असंतोष की जो फुसफुसाहट शुरू हुई थी, वह अब खुली बगावत में बदल चुकी है, जिससे पार्टी की संसदीय बेंच दिन-ब-दिन छोटी होती जा रही है। सुष्मिता देव का हालिया इस्तीफा, जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस और राज्यसभा दोनों से किनारा कर लिया है, ने पार्टी को झकझोर कर रख दिया है। सुखेन्दु शेखर रॉय के इस्तीफे के बाद, एक सप्ताह के भीतर यह दूसरा बड़ा झटका है।

यह आंतरिक संकट अब पर्दे के पीछे नहीं रहा। सूत्रों के अनुसार, सांसदों का एक बड़ा धड़ा, जिसमें जून मालिया, देव, सायनी घोष और रचना बनर्जी जैसे सांसद शामिल हैं जो काकोली के नेतृत्व वाले बागी गुट का समर्थन कर रहे हैं, अपनी निष्ठा बदल रहे हैं। इस गुट में सायनी घोष का शामिल होना नेतृत्व के लिए विशेष रूप से कष्टदायक है, क्योंकि यह सदन के पटल पर पार्टी की ताकत को और कमजोर करता है। असंतुष्टों का दावा है कि लगभग 20 सांसद भाजपा के नेतृत्व वाले NDA में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं, जिससे संसद में गणित तेजी से ममता बनर्जी के खिलाफ होता जा रहा है।

दोराहे पर खड़ी पार्टी

बगावत चरम पर है और वरिष्ठ नेता खुलकर शीर्ष नेतृत्व की तानाशाही कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। जैसे-जैसे दबाव बढ़ रहा है, पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी को दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलते देखा गया, जिसका उद्देश्य विपक्षी एकता को मजबूत करना था, लेकिन घर में मची उथल-पुथल ने स्थिति को जटिल बना दिया है। यह हलचल ममता बनर्जी की सोनिया गांधी के साथ हालिया चर्चाओं के बाद आई है, जो यह दर्शाता है कि घर का मोर्चा ढहने के बीच गठबंधन को बचाने की हताश कोशिश की जा रही है।

भाजपा ने इस मौके को भुनाने में देर नहीं की है। पार्टी नेता खगेन मुर्मू ने इसे टीएमसी के प्रभाव का "पूर्ण पतन" करार दिया है। उन्होंने दावा किया कि तृणमूल के दबदबे का युग प्रभावी रूप से समाप्त हो गया है और भविष्यवाणी की कि जल्द ही पार्टी केवल अपने शीर्ष दो नेताओं तक सिमट कर रह जाएगी। हालांकि इस तरह की राजनीतिक बयानबाजी अपेक्षित है, लेकिन इस्तीफों की संख्या भाजपा के इन दावों को वजन दे रही है कि टीएमसी अपनी पकड़ खो रही है।

यह क्यों मायने रखता है

यह उथल-पुथल तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती है। ऐतिहासिक रूप से, पार्टी एक केंद्रीकृत कमान संरचना पर फली-फूली है, लेकिन मौजूदा पलायन यह बताता है कि नेताओं के इस गठबंधन को जोड़े रखने वाला गुरुत्वाकर्षण कमजोर हो रहा है। यदि 20 सांसदों के पाला बदलने की खबर सच साबित होती है, तो यह संसद में विपक्ष की ताकत को पूरी तरह बदल देगा और बंगाल में भाजपा की विस्तारवादी रणनीति को और बढ़ावा देगा।

टीएमसी के लिए आगे की राह बहुत कठिन है। उन्हें एक नाजुक संतुलन बनाना होगा: काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले गुट के प्रभाव को रोकना और साथ ही उस 'डोमिनो इफेक्ट' को थामना जो पार्टी को खोखला कर सकता है। संसदीय सत्र के अगले कुछ सप्ताह इस बात का लिटमस टेस्ट होंगे कि क्या ममता बनर्जी नियंत्रण हासिल कर पाती हैं या पार्टी वास्तव में एक प्रमुख राष्ट्रीय खिलाड़ी के रूप में अपने अंतिम अध्याय की ओर बढ़ रही है।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।