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TMC का संसदीय वर्चस्व खत्म: काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ आए कई दिग्गज सांसद

TMC सांसद संकट: जून मालिया, देव, सायनी घोष और रचना बनर्जी जैसे बड़े नाम बागी गुट के समर्थन में

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 11 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
TMC का संसदीय वर्चस्व खत्म: काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ आए कई दिग्गज सांसद
TMC का संसदीय वर्चस्व खत्म: काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ आए कई दिग्गज सांसद

तृणमूल कांग्रेस के भीतर मची भगदड़ और खुले विद्रोह ने ममता बनर्जी की पार्टी के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक संकट खड़ा कर दिया है, जिससे दिल्ली में पार्टी के भविष्य पर सवाल उठने लगे हैं।

दिल्ली के सत्ता के गलियारे TMC सांसद संकट की चर्चाओं से गर्म हैं। यह स्थिति महज अटकलों से आगे बढ़कर तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पकड़ के लिए एक वास्तविक खतरा बन गई है। जो पार्टी कभी खुद को BJP के खिलाफ एक एकजुट ताकत के रूप में पेश करती थी, वह अब भारी आंतरिक कलह से जूझ रही है। नेतृत्व को हिला देने वाले इस घटनाक्रम में जून मालिया, देव, सायनी घोष और रचना बनर्जी जैसे प्रमुख नाम काकोली के नेतृत्व वाले बागी गुट का समर्थन कर रहे हैं, जो पार्टी में पड़ी एक बड़ी दरार का संकेत है।

यह विद्रोह तब और तेज हो गया जब पार्टी के राज्यसभा सदस्यों ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया। सुष्मिता देव का इस्तीफा और उसके तुरंत बाद सुखेन्दु शेखर रॉय का बाहर होना, नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। बागी खेमे का दावा है कि करीब 20 सांसद अभी अपने विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, जिनमें से कई कथित तौर पर BJP के नेतृत्व वाले NDA में शामिल होने की तैयारी में हैं।

बदलती निष्ठाएं

यह पार्टी संकट तब और गहरा गया जब लोकसभा का एक प्रमुख चेहरा, सायनी घोष, कथित तौर पर काकोली घोष दस्तीदार के गुट में शामिल हो गईं। यह बदलाव केवल संख्या का नुकसान नहीं है, बल्कि संसद में एक एकजुट ब्लॉक के रूप में कार्य करने की पार्टी की क्षमता पर एक रणनीतिक प्रहार है। जैसे-जैसे TMC सांसद संकट की खबरें सुर्खियों में बनी हुई हैं, वरिष्ठ नेताओं ने खुलेआम एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू कर दिए हैं, जिससे आंतरिक मतभेद सार्वजनिक और अपरिवर्तनीय हो गए हैं।

कोलकाता में झटके महसूस किए जा रहे हैं, वहीं पार्टी का नेतृत्व राजधानी में सक्रिय है। ममता बनर्जी की सोनिया गांधी के साथ विपक्षी एकता पर बातचीत के ठीक एक दिन बाद अभिषेक बनर्जी की राहुल गांधी के साथ बैठक यह दर्शाती है कि पार्टी अपनी राष्ट्रीय स्थिति को स्थिर करने के लिए बेताब है। हालांकि, इन बैठकों की चर्चा सांसदों के दल-बदल की खबरों के आगे फीकी पड़ गई है।

यह क्यों मायने रखता है: चौराहे पर खड़ी पार्टी

यह केवल व्यक्तिगत इस्तीफों का मामला नहीं है, बल्कि यह उस एकाधिकारवादी ढांचे के लिए एक मौलिक चुनौती है जिसे तृणमूल कांग्रेस ने वर्षों से बनाए रखा था। असंतोष का यह पैटर्न बताता है कि पार्टी का केंद्रीय नियंत्रण कमजोर हो रहा है और BJP इस खालीपन का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। जब खगेन मुर्मू जैसे विपक्षी नेता यह दावा करते हैं कि पार्टी "पूर्ण पतन" की ओर बढ़ रही है और अंततः केवल मुख्य परिवार ही बचेगा, तो यह जमीन पर लड़ी जा रही नैरेटिव की लड़ाई को दर्शाता है।

यदि यह पलायन जारी रहता है, तो राष्ट्रीय विपक्षी गठबंधनों के लिए धुरी के रूप में काम करने की तृणमूल की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होगी। पार्टी अब केवल चुनावी मैदान में BJP से नहीं लड़ रही है; वह अपने अस्तित्व के लिए उस आंतरिक विद्रोह से लड़ रही है जो उसकी संसदीय उपस्थिति को भीतर से खोखला करने की धमकी दे रहा है।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।