तेहरान की रस्सी पर संतुलन: ओबामा और ट्रंप की ईरान नीतियां आज भी दुनिया को क्यों प्रभावित कर रही हैं
ईरान को कौन ज्यादा झुका पाया? ट्रंप या ओबामा, दो डील की कहानी
2015 के JCPOA से लेकर अधिकतम दबाव के दौर तक, ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करने का संघर्ष अमेरिकी विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा बना हुआ है।
तेहरान से निपटने के तरीके पर बहस जितनी राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में है, उतनी ही यह स्वभाव के बारे में भी है। लगभग एक दशक से, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने दो अमेरिकी राष्ट्रपतियों को ईरानी परमाणु मुद्दे पर बिल्कुल विपरीत दृष्टिकोण अपनाते देखा है। जहाँ बराक ओबामा ने अपनी उम्मीदें समझौते की कला पर टिकी रखीं, वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने पूरी बिसात ही पलट देने का सख्त रास्ता चुना। जब हम इन दोनों रणनीतियों की विरासत को देखते हैं, तो अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
समझौते के वास्तुकार
2015 का जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) मूल रूप से बहुपक्षवाद की एक मैराथन थी। ओबामा के नेतृत्व में, वैश्विक शक्तियों—ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन—ने एक जटिल समझौते पर पहुंचने के लिए ईरानी वार्ताकारों के साथ बातचीत की। इसका प्राथमिक लक्ष्य सरल था: बिना एक भी गोली चलाए परमाणु बम के रास्ते को बंद करना। यूरेनियम संवर्धन को सीमित करने और सेंट्रीफ्यूज की संख्या में कटौती करने पर सहमत होकर, ईरान ने दमघोंटू आर्थिक प्रतिबंधों से राहत हासिल की। यह एक ऐसा सौदा था जहाँ कूटनीति के जरिए 80 से 90 प्रतिशत समस्या का समाधान हो गया था, जिससे IAEA निरीक्षकों के लिए शांति की पुष्टि करने का रास्ता खुला रहा।
अधिकतम दबाव की रणनीति
डोनाल्ड ट्रंप के आगमन ने एक हिंसक यू-टर्न का संकेत दिया। JCPOA को एक त्रुटिपूर्ण मूल समझौता बताते हुए, ट्रंप प्रशासन ने उस नीति की ओर रुख किया जिसे उन्होंने 'अधिकतम दबाव' कहा। उद्देश्य वही रहा—ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को निशस्त्र करना—लेकिन तरीका हाथ मिलाने से बदलकर आर्थिक घेराबंदी का हो गया। समझौते से बाहर निकलकर और कठोर प्रतिबंधों को फिर से लागू करके, वाशिंगटन ने तेहरान को कोने में धकेलने की कोशिश की, इस विचार के साथ कि एक कमजोर ईरानी अर्थव्यवस्था अंततः उन्हें एक बेहतर और अधिक व्यापक समर्पण के लिए मजबूर करेगी।
ओबामा की आलोचना
ओबामा इस आक्रामक बदलाव के मुखर आलोचक रहे हैं। हालिया प्रतिक्रियाओं में, उन्होंने सुझाव दिया कि धमकाने या हवाई बमबारी का आकर्षण अक्सर एक मृगतृष्णा होता है। उनके लिए, विदेश नीति का सबक यह है कि धैर्य कमजोरी नहीं है। उनका तर्क है कि अधूरे समझौते भी परमाणु खतरों पर एक आवश्यक सीमा प्रदान करते हैं, जिससे युद्ध की उस तात्कालिक आहट को रोका जा सकता है जो अक्सर कूटनीतिक चैनलों के टूटने के बाद सुनाई देती है। ओबामा के लिए, यह 'सबक' ऐसा है जिसे वाशिंगटन हर कुछ वर्षों में फिर से सीखने के लिए मजबूर होता है: कूटनीति भले ही 100 प्रतिशत प्रभावी न हो, लेकिन यह विकल्प की तुलना में कहीं अधिक सस्ती और सुरक्षित है।
यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर
यह खींचतान इस बात को दर्शाती है कि वैश्विक शक्तियां बल और समझौतों की उपयोगिता को कैसे देखती हैं। यहाँ बड़ी तस्वीर केवल सेंट्रीफ्यूज के बारे में नहीं है; यह अंतरराष्ट्रीय समझौतों की विश्वसनीयता के बारे में है। जब एक प्रशासन JCPOA जैसा ढांचा बनाता है और अगला उसे नष्ट कर देता है, तो यह एक 'पॉलिसी व्हिपलैश' (नीतिगत झटका) पैदा करता है, जिससे सहयोगियों या विरोधियों के लिए यह जानना लगभग असंभव हो जाता है कि अमेरिका का रुख क्या है। भारत के लिए, जो फारस की खाड़ी में हितों का एक नाजुक संतुलन बनाए रखता है, यह अस्थिरता व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक निरंतर चुनौती है। यह पैटर्न बताता है कि जब तक अमेरिका तेहरान के प्रति अपने दृष्टिकोण पर विभाजित रहेगा, ईरानी परमाणु फाइल वैश्विक व्यवस्था में एक उच्च-दांव और अनसुलझा तनाव बनी रहेगी।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।