Politicalpedia
राष्ट्रीय

भारतीय राजनीति का 'रिवॉल्विंग डोर': पार्टियां जितनी आसानी से बनती हैं, उतनी ही आसानी से टूट क्यों जाती हैं?

राजनीतिक दलों के बनने और टूटने से मिलने वाले सबक

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 18 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
भारतीय राजनीति का 'रिवॉल्विंग डोर': पार्टियां जितनी आसानी से बनती हैं, उतनी ही आसानी से टूट क्यों जाती हैं?
भारतीय राजनीति का 'रिवॉल्विंग डोर': पार्टियां जितनी आसानी से बनती हैं, उतनी ही आसानी से टूट क्यों जाती हैं?

देश में 2,800 से अधिक पंजीकृत राजनीतिक दल अपनी जगह बनाने की होड़ में हैं। कमजोर संस्थाओं और विचारधारा की कमी के कारण देश का लोकतांत्रिक ढांचा चरमरा रहा है।

नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में आजकल एक जानी-पहचानी और निराशाजनक हलचल है: नेताओं का पाला बदलने की आपाधापी और नए राजनीतिक मंचों का जल्दबाजी में गठन। पश्चिम बंगाल में आए बड़े बदलावों से लेकर राज्य विधानसभाओं में बनी रहने वाली अस्थिरता तक, यह चलन साफ है। पार्टियां अभूतपूर्व दर से टूट रही हैं, जिससे एक ऐसा परिदृश्य बन गया है जहां सत्ता की राजनीति ने शासन के मूल उद्देश्य को पूरी तरह से पीछे छोड़ दिया है।

आंकड़े एक गैर-गंभीर लोकतांत्रिक कवायद की कहानी बयां करते हैं। वर्तमान में हमारे पास छह राष्ट्रीय पार्टियां, 67 राज्य-स्तरीय दल और 2,854 पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त संस्थाएं हैं। हमारे कानून एक पार्टी बनाना बच्चों का खेल बना देते हैं—यह किसी विजन के प्रति प्रतिबद्धता के बजाय एक मामूली प्रशासनिक कार्य बन गया है। प्रवेश की बाधा इतनी कम होने के कारण, हम ऐसी 'पार्टियों' से भरे पड़े हैं जो केवल कागजों पर मौजूद हैं, जिनमें कोई स्पष्ट विचारधारा, संगठनात्मक ढांचा या आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं है।

वंशवाद का शिकार

यह समस्या अक्सर शीर्ष से शुरू होती है। जब कोई पार्टी किसी एक वंश की निजी जागीर बन जाती है, तो आंतरिक लोकतंत्र सबसे पहले खत्म होता है। विचारधारा के बजाय अस्तित्व बचाना प्राथमिकता बन जाती है, और पार्टी की कार्यकारी समितियां नीतिगत बहस के केंद्रों के बजाय केवल रबर स्टैम्प बनकर रह जाती हैं। कार्नेगी जैसे संस्थानों का शोध अक्सर यह बताता है कि जब कोई राजनीतिक संगठन साझा मूल्यों के बजाय किसी व्यक्ति या परिवार के इर्द-गिर्द बनाया जाता है, तो उसका संगठनात्मक बंधन कमजोर होता है।

उन्हें एक साथ बांधे रखने वाले किसी मुख्य मिशन के अभाव में, ये पार्टियां मूल रूप से खाली खोल की तरह हैं। जैसे ही चुनावी हवा का रुख बदलता है, सदस्यों के पास दूसरे मंच पर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यही कारण है कि बीजेपी के उल्लेखनीय अपवाद को छोड़कर, लगभग हर प्रमुख मान्यता प्राप्त पार्टी ने विभाजन का दंश झेला है।

बड़ी तस्वीर

यह मायने क्यों रखता है? क्योंकि संस्थागत पार्टियों के बिना लोकतंत्र खतरे में है। जब पार्टियां राज्य के स्थिर स्तंभों के बजाय अस्थायी स्टार्टअप की तरह काम करती हैं, तो मतदाता के पास विकल्पों का एक ऐसा चक्र होता है जो सब एक जैसे दिखते हैं। हम सिर्फ पार्टियों को टूटते हुए नहीं देख रहे हैं; हम राजनीतिक शिक्षा के क्षरण को देख रहे हैं।

वैश्विक संदर्भ बताता है कि हम इस संकट में अकेले नहीं हैं। चाहे वह पश्चिम में चुनावी हार से मिले सबक हों या श्रीलंका जैसी जगहों पर पुराने राजनीतिक चक्रों से बाहर निकलने का संघर्ष, यह चुनौती सार्वभौमिक है। इसमें समानता यह है कि जवाबदेही की कमी है और दल-बदल के खिलाफ जनता का कोई प्रभावी दबाव नहीं है। यदि मतदाता पार्टियों के बनने और टूटने को केवल मनोरंजन के रूप में देखते हैं, तो हम उस संस्थागत दबाव को खो देते हैं जो पार्टियों को सुधार के लिए मजबूर कर सकता है।

जब तक इन समूहों के गठन और फंडिंग को नियंत्रित करने वाले कानूनों को सख्त नहीं किया जाता—पारदर्शिता, नियमित नेतृत्व चुनाव और वास्तविक कैडर प्रशिक्षण की मांग नहीं की जाती—तब तक पार्टियों की यह 'बंपर फसल' जनहित के बजाय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को ही पूरा करती रहेगी। बिखराव का यह वर्तमान चक्र सिर्फ अगला चुनाव जीतने के बारे में नहीं है; यह इस बारे में है कि क्या हमारी राजनीतिक व्यवस्था भविष्य का निर्माण कर रही है या सिर्फ अतीत को जला रही है।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।