एक और टूट की आहट: उद्धव गुट के छह सांसद शिंदे खेमे में शामिल होने को तैयार
वीडियो | ठाकरे गुट के बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखा पत्र, जल्द हो सकता है ऐलान: सूत्र
उद्धव ठाकरे गुट एक नए आंतरिक संकट का सामना कर रहा है। छह सांसदों ने औपचारिक रूप से लोकसभा अध्यक्ष से संपर्क किया है, जो महाराष्ट्र के अस्थिर राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत है।
नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में एक और बड़े दलबदल की चर्चा तेज है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के लिए राजनीतिक जमीन एक बार फिर खिसकती दिख रही है; पार्टी के छह मौजूदा सांसदों ने अलग होने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अपनी निष्ठा बदलने का औपचारिक संकेत देकर इन नेताओं ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय का रास्ता साफ कर दिया है। सूत्रों का कहना है कि इसका ऐलान 21 जून तक हो सकता है।
यह कदम 'ऑपरेशन टाइगर' के नाम से चर्चित पर्दे के पीछे की सक्रियता के बाद उठाया गया है, जिसके तहत इन सांसदों ने राजधानी में कई दौर की बैठकें कीं। हालांकि ठाकरे खेमा अब तक मजबूती दिखाने का दावा करता रहा है, लेकिन समाचार प्लेटफॉर्मों पर वायरल हो रहे वीडियो क्लिप्स में दिख रही यह घटना पार्टी के संसदीय ढांचे में गहरी दरार की ओर इशारा करती है।
नींव में पड़ती दरारें
इस संभावित बगावत के पीछे की वजह विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक अस्तित्व बचाने की है। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि स्पष्ट नेतृत्व की कमी और घटता जनाधार इन सांसदों को शिंदे खेमे की ओर धकेल रहा है। कई नेताओं का मानना है कि विभाजन के बाद पार्टी की पहचान आम जनता के बीच अपनी पकड़ खो रही है, जिससे अगले चुनावों को लेकर सांसद खुद को अलग-थलग और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
ठाकरे गुट के प्रमुख चेहरे संजय राउत इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं। वे लगातार बागी नेताओं पर निशाना साध रहे हैं और दलबदल के दावों को खारिज कर रहे हैं। हालांकि, उनके तीखे बयानों को प्रतिद्वंद्वी शिवसेना खेमे ने सिरे से नकार दिया है। उनका तर्क है कि ठाकरे खेमे के भीतर स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। जैसे-जैसे ठाकरे गुट के बागी लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिख रहे हैं, मूल पार्टी का विधायी प्रभाव काफी कम होता दिख रहा है।
यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर
यह घटना केवल निष्ठा बदलने का मामला नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यदि ये छह सांसद शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय करने में सफल हो जाते हैं, तो यह मुंबई और नई दिल्ली दोनों जगह सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह बदल देगा। ठाकरे गुट के लिए यह केवल संख्याबल का नुकसान नहीं, बल्कि शिवसेना की विरासत के 'असली' वारिस होने के उनके दावे पर भी एक बड़ा प्रहार है।
ऐतिहासिक रूप से, इस तरह के विभाजन ऐसी गहरी दरारें पैदा करते हैं जिन्हें भरना मुश्किल होता है। इससे नगर निगमों से लेकर राज्य-स्तरीय गठबंधनों तक स्थानीय सत्ता संरचनाओं में बदलाव आता है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट मूल शिवसेना विभाजन से जुड़ी कानूनी लड़ाई की निगरानी कर रहा है, ऐसे में यह नया समानांतर दलबदल जटिलताओं की नई परतें जोड़ता है, जो महाराष्ट्र की राजनीति को आने वाले महीनों तक अनिश्चितता की स्थिति में रख सकता है। आने वाले दिन बताएंगे कि क्या यह ठाकरे गुट के लिए अंतिम झटका है या उनके पास अभी भी वापसी करने की राजनीतिक ताकत बची है।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।