ऑपरेशन टाइगर: दिल्ली बैठक में उद्धव सेना की वफादारी की अग्निपरीक्षा
पार्टी में टूट की अटकलों के बीच उद्धव सेना ने आज दिल्ली में अपने सभी सांसदों की बैठक बुलाई
तीन-लाइन व्हिप जारी होने और पार्टी में नई टूट की सुगबुगाहट के बीच, शिवसेना (UBT) अपने संसदीय अस्तित्व की एक बड़ी परीक्षा का सामना कर रही है।
दिल्ली के सत्ता के गलियारों में तनाव का माहौल है, क्योंकि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) ने आज अपने सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। यह कोई सामान्य बैठक नहीं है। पार्टी के भीतर नई टूट की लगातार आ रही खबरों के बीच, नेतृत्व ने तीन-लाइन व्हिप जारी किया है। इसका मतलब है कि बैठक में उपस्थिति अनिवार्य है और किसी भी सांसद की अनुपस्थिति को संभावित बगावत के रूप में देखा जाएगा।
यह हड़कंप उन खबरों के बाद मचा है जिनमें दावा किया गया है कि बागी सांसदों का एक गुट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से संपर्क कर चुका है। सूत्रों के अनुसार, ये बागी सांसद पार्टी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह का समर्थन होने का दावा कर रहे हैं। यदि यह सच साबित होता है, तो यह दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा होगा। राजनीतिक गलियारों में इसे 'ऑपरेशन टाइगर' नाम दिया जा रहा है, जिसे कथित तौर पर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के हालिया दिल्ली दौरे के दौरान तैयार किया गया है।
दोराहे पर खड़ी पार्टी
उद्धव सेना के लिए दांव पर बहुत कुछ लगा है। 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विद्रोह के बाद, जिसने महा विकास अघाड़ी सरकार को गिरा दिया था, पार्टी एक बार फिर अपनी संसदीय एकजुटता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। हालांकि पार्टी के वफादार नेता किसी भी तरह की टूट से इनकार कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है—कुछ सांसदों के संपर्क से बाहर होने की खबरें स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं।
‘ऑपरेशन टाइगर’ की रणनीति काफी सोची-समझी लगती है। सूत्रों का कहना है कि हालांकि पाला बदलने की जमीन तैयार कर ली गई है, लेकिन सांसदों को शिंदे गुट में शामिल करने की प्रक्रिया को जानबूझकर रोका गया है। ऐसा माना जा रहा है कि प्रतिद्वंद्वी गुट ठाकरे खेमे की कानूनी और रक्षात्मक चालों पर नजर रख रहा है, ताकि कोई भी कदम उठाने से पहले सभी तकनीकी पहलुओं को पुख्ता किया जा सके।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह ताजा घटनाक्रम भारतीय राजनीति की अस्थिर प्रकृति की याद दिलाता है, जहां पार्टी के प्रति वफादारी की परिभाषा लगातार बदलती रहती है। यदि उद्धव सेना को एक और दलबदल का सामना करना पड़ता है, तो यह न केवल उनकी विधायी ताकत के लिए नुकसान होगा, बल्कि 2022 के बाद अपनी विरासत को फिर से हासिल करने की पार्टी की कोशिशों के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका भी होगा।
यहाँ पैटर्न स्पष्ट है: शिवसेना की आत्मा की लड़ाई अब केवल रैलियों या चुनावी दांव-पेंच तक सीमित नहीं है; यह दिल्ली की बंद कमरों वाली बैठकों में लड़ी जा रही है। क्या उद्धव ठाकरे अपने बाकी सांसदों को एकजुट रख पाएंगे, या पार्टी एक और विनाशकारी टूट की ओर बढ़ रही है? इसका फैसला आज बैठक में शामिल होने वाले नौ सांसदों की उपस्थिति और उनके रुख पर निर्भर करेगा। फिलहाल, चर्चाओं का बाजार गर्म है और गलती की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।