कोलकाता में सत्ता का समीकरण: फिरहाद हकीम का इस्तीफा और टीएमसी में बढ़ती दरारें
क्या टीएमसी संकट में है? फिरहाद हकीम की रिताब्रता बनर्जी से मुलाकात | ममता बनर्जी के खेमे से एक और बड़ा निकास

फिरहाद हकीम के मेयर पद से हटने के साथ ही, तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती दरार ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए एक नाजुक मोड़ का संकेत दे रही है।
कोलकाता की सत्ता के गलियारे शायद ही कभी शांत रहते हैं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर का मौजूदा माहौल कुछ अलग ही बयां कर रहा है। कोलकाता नगर निगम के मेयर पद से फिरहाद हकीम का इस्तीफा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक बड़ा झटका है। हालांकि पार्टी का आधिकारिक रुख यह है कि यह बदलाव खुद ममता बनर्जी की सहमति से हुआ है, लेकिन इसका समय—जो कि पार्टी छोड़ने वालों की लहर और महत्वपूर्ण बैठकों में घटती उपस्थिति के बीच आया है—एक ऐसी पार्टी की कहानी कहता है जो अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।
वह मुलाकात जिसने अटकलों को हवा दी
राजनीतिक जानकारों ने हकीम और बागी विधायक रिताब्रता बनर्जी के बीच हुई एक महत्वपूर्ण मुलाकात पर तुरंत गौर किया। यह मुलाकात, जो ठीक उस समय हुई जब टीएमसी में मचे घमासान की चर्चा राजनीतिक गलियारों में हावी होने लगी थी, मौजूदा अशांति का केंद्र बन गई है। एक ऐसी पार्टी के लिए जो ऐतिहासिक रूप से अपनी आंतरिक वफादारी पर टिकी रही है, फिरहाद हकीम और रिताब्रता की मुलाकात यह संकेत देती है कि संवाद की रेखाएं अब कालीघाट के भीतरी दायरे तक सीमित नहीं रह गई हैं।
हाल ही में हुई पार्टी की एक बैठक में केवल आठ विधायकों की उपस्थिति ने इस बेचैनी को चरम पर पहुंचा दिया है। यह संख्या में भारी गिरावट है, जिसने पार्टी तंत्र पर ममता बनर्जी की पकड़ बनाए रखने की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुष्मिता देव से लेकर अन्य पुराने दिग्गजों तक, नेताओं का यह पलायन बताता है कि टीएमसी के खेमे से हो रही यह 'बड़ी निकासी' अब महज एक छोटी घटना नहीं, बल्कि एक ऐसा चलन बन गई है जिसे रोकने में पार्टी संघर्ष कर रही है।
बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है
पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब कोई पार्टी अपनी अपराजेयता का आभा खो देती है, तो उसका पतन अक्सर तेजी से होता है। मौजूदा अस्थिरता केवल व्यक्तिगत इस्तीफों के बारे में नहीं है; यह टीएमसी की संरचनात्मक अखंडता के क्षरण के बारे में है। जब हकीम जैसा करीबी सहयोगी पद छोड़ता है, तो यह एक ऐसा शून्य पैदा करता है जो और अधिक अटकलों और अस्थिरता को आमंत्रित करता है। क्या यह पूरी तरह से विघटन की ओर ले जाएगा या एक रणनीतिक पुनर्गठन की ओर, यह राज्य पर नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों के लिए सबसे बड़ा सवाल है।
पार्टी छोड़ने का यह सिलसिला और अभिषेक बनर्जी सहित शीर्ष नेतृत्व तक ईडी के समन पहुंचने से एक 'घेराबंदी वाली मानसिकता' पैदा हो गई है। टीएमसी के लिए चुनौती दोहरी है: उन्हें अस्थिर दिख रही पार्टी की छवि को संभालना है और साथ ही अपने बाकी विधायकों को पार्टी छोड़ने से रोकना है। बंगाल की राजनीति के उतार-चढ़ाव भरे परिदृश्य में, आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि यह एक अस्थायी झटका है या लंबे समय तक चलने वाले चुनावी सूर्यास्त की शुरुआत।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।