शानदार वापसी: क्या 'ग्रैंड ओल्ड पार्टी' आखिरकार अपना खोया आधार वापस पा रही है?
विपक्ष में बदल रहा पावर बैलेंस! ममता-तेजस्वी-स्टालिन की बर्बादी देख कांग्रेस होगी खुश
जैसे-जैसे क्षेत्रीय दिग्गज अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे हैं, बदलता राजनीतिक परिदृश्य कांग्रेस के लिए अपनी खोई हुई चुनावी जमीन वापस पाने का एक अनपेक्षित रास्ता खोल रहा है।
सत्ता के गलियारे अक्सर चक्रीय होते हैं, लेकिन भारतीय राजनीति को बदलने वाला ऐसा तीव्र उलटफेर कम ही देखने को मिलता है। वर्षों तक, क्षेत्रीय दिग्गजों—जो कांग्रेस के खंडहरों पर बनी पार्टियां थीं—का दबदबा रहा, जो शर्तें तय करते थे और ग्रैंड ओल्ड पार्टी को एक जूनियर पार्टनर की तरह देखते थे। पश्चिम बंगाल से लेकर बिहार और दक्षिणी राज्यों तक, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और एम.के. स्टालिन जैसे नेताओं ने कांग्रेस के वोट बैंक को सफलतापूर्वक निगल लिया था। आज, जब ये पार्टियां आंतरिक कलह और चुनावी गिरावट से जूझ रही हैं, तो एक शांत और रणनीतिक बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
यह क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए सिर्फ दुर्भाग्य की बात नहीं है; यह एक संरचनात्मक सुधार है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का उदाहरण लें। 90 के दशक के अंत में, उन्होंने वामपंथ-विरोधी भावनाओं को भुनाया, जो कभी कांग्रेस के समर्थन का आधार हुआ करती थी। 2011 तक, उन्होंने वामपंथ के तीन दशक के वर्चस्व को खत्म कर दिया, लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने कांग्रेस को एक हाशिए की पार्टी बना दिया, जिसका वोट शेयर 2021 तक 3% से भी कम हो गया। फिर भी, वक्त का पहिया घूम गया है। भ्रष्टाचार के बढ़ते आरोपों और संगठनात्मक पतन का सामना कर रही तृणमूल कांग्रेस अब रक्षात्मक मुद्रा में है, और संभावित विलय की अफवाहें हवा में तैर रही हैं।
अहंकार की कीमत
यह पैटर्न पूरे देश में एक जैसा है। एक समय था जब तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन जैसे नेता कांग्रेस को एक अतिरिक्त सीट देने में भी हिचकिचाते थे। तर्क सरल था: क्षेत्रीय पार्टियों ने खुद को अपने राज्य के हितों के प्राथमिक संरक्षक के रूप में स्थापित कर लिया था। तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल, जो कभी बिहार में एक दुर्जेय शक्ति थी, भी अपनी राजनीतिक पूंजी में कमी देख रही है। वह अहंकार जो कभी 'इंडिया' गठबंधन की बैठकों में दिखता था—जहां क्षेत्रीय नेता अक्सर कांग्रेस नेतृत्व को दरकिनार कर देते थे—अब एक गंभीर वास्तविकता से बदल रहा है।
ये पार्टियां कांग्रेस के खालीपन की लाभार्थी थीं, जो उन मतदाताओं को अपने पाले में लेकर सत्ता में आईं जो कभी दिल्ली में हाई कमान की ओर देखते थे। अब, जैसे-जैसे ये क्षेत्रीय दल लड़खड़ा रहे हैं, कांग्रेस को अपने पक्ष में एक जगह बनती दिख रही है। यह राजनीतिक पेंडुलम के वापस केंद्र की ओर आने का एक क्लासिक मामला है। जब 'एंटी-इनकंबेंसी' का गुस्सा किसी क्षेत्रीय पार्टी से हटता है, तो नाराज मतदाता के लिए डिफ़ॉल्ट विकल्प अक्सर वही राष्ट्रीय विकल्प होता है जिसे उन्होंने कभी छोड़ दिया था।
यह क्यों मायने रखता है
बड़ी तस्वीर यह है कि एक द्विध्रुवीय या बहुध्रुवीय मुकाबले की बहाली हो सकती है, जहां कांग्रेस फिर से प्राथमिक चुनौती देने वाली पार्टी बन जाए, न कि केवल एक माध्यमिक गठबंधन सहयोगी। यदि क्षेत्रीय पार्टियां अपनी पकड़ खोती रहती हैं, तो कांग्रेस को जरूरी नहीं कि नए मतदाता 'जीतने' हों; उसे बस उस बर्तन की तरह तैयार रहना है जो अपने मूल आधार को वापस इकट्ठा कर सके। यह बदलाव भविष्य के किसी भी विपक्षी गठबंधन के भीतर सौदेबाजी की शक्ति को बदल देता है। क्षेत्रीय नेताओं द्वारा कांग्रेस को निर्देश देने के दिन शायद गिने-चुने हैं, क्योंकि कांग्रेस को अब एहसास हो गया है कि समय किसी का इंतजार नहीं करता।
यह मूल रिपोर्ट, प्राथमिक डेटा और news18hindi कवरेज से तैयार की गई है, जो दर्शाती है कि भारतीय राजनीति का अगला चरण इस बात से तय होगा कि कौन सी पार्टी इन क्षेत्रीय दिग्गजों के पतन से पैदा हुई निराशा को बेहतर ढंग से भुना पाती है। क्या यह एक स्थायी पुनरुत्थान है या क्षेत्रीय प्रभुत्व में अस्थायी ठहराव, यह अगले चुनावी चक्र के करीब आने पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल बना रहेगा।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।