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भारतीय छात्रों के लिए 'अमेरिकन ड्रीम' बना एक डरावना सच

अमेरिकी दुःस्वप्न: भारतीय प्रवासियों की चमक-धमक भरी कहानियों के पीछे छिपी है एक स्याह हकीकत

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 5 जुलाई 2026· 2 मिनट पढ़ें
भारतीय छात्रों के लिए 'अमेरिकन ड्रीम' बना एक डरावना सच
भारतीय छात्रों के लिए 'अमेरिकन ड्रीम' बना एक डरावना सच

अनसुलझी हत्याओं से लेकर फिरौती की खौफनाक कॉल्स तक, अमेरिका में भारतीय छात्रों की बढ़ती मौतों ने भारत में उनके परिवारों को झकझोर कर रख दिया है।

हैदराबाद के नचाराम में मोहम्मद सलीम के पास आया फोन कॉल किसी वज्रपात जैसा था। फोन पर एक अनजान व्यक्ति ने दावा किया कि उसने उनके बेटे मोहम्मद अब्दुल अरफात को अगवा कर लिया है। उसने 1,200 डॉलर की फिरौती मांगी और उसके अंग निकालने की धमकी दी। अरफात, जो 2023 में क्लीवलैंड स्टेट यूनिवर्सिटी से आईटी की डिग्री लेने के सपने के साथ अमेरिका गया था, फिर कभी जिंदा नहीं मिला। एक महीने बाद जब लेक एरी से उसका शव बरामद हुआ, तो वह फिरौती वाला कॉल एक अनसुलझी पहेली बनकर रह गया। इस मामले में न तो कोई गिरफ्तारी हुई और न ही स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों से कोई स्पष्ट जानकारी मिली।

अरफात की कहानी कोई इकलौती त्रासदी नहीं है; यह एक ऐसा पैटर्न बन गया है जिससे हैदराबाद के कई परिवार शोक में डूबे हैं। निकिता गोडिशला की कथित हत्या के छह महीने बाद भी तरनाका में उसका परिवार जवाब का इंतजार कर रहा है। औपचारिक शिकायतों के बावजूद, जांच ठंडे बस्ते में चली गई है। मुख्य आरोपी अर्जुन शर्मा फरार है और स्थानीय पुलिस ने पुष्टि की है कि उसे पकड़ने के लिए अमेरिकी अधिकारियों की ओर से कोई संपर्क नहीं किया गया है।

आंकड़ों के पीछे बढ़ता मौतों का सिलसिला

इस संकट का दायरा बहुत बड़ा है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच अमेरिकी धरती पर 141 भारतीय छात्रों की मौत हुई है। ये आंकड़े चिंताजनक हैं, 2024 में अकेले 44 मौतें हुईं—यानी लगभग हर आठ दिन में एक छात्र की जान गई। भले ही 2025 में अमेरिका जाने वाले छात्रों की संख्या में कमी आई है, लेकिन मौतों का आंकड़ा पहले ही 30 तक पहुंच चुका है, जो बताता है कि इन युवाओं के लिए जोखिम अभी भी बहुत अधिक है।

ये केवल सरकारी फाइलों के आंकड़े नहीं हैं। हर नाम निकिता या अरफात जैसा एक छात्र है, जिसने वैश्विक शिक्षा के वादे के साथ घर छोड़ा था, लेकिन उसे हिंसा, दुर्घटनाओं या रहस्यमय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। पीछे छूटे परिवारों के लिए, हैदराबाद और अमेरिका के बीच की दूरी एक कभी न भरने वाली खाई जैसी है। उन्हें अक्सर हजारों मील दूर से जांच को संभालना पड़ता है, जिसमें पारदर्शिता की कमी और विदेशी एजेंसियों की उदासीनता सबसे बड़ी बाधा है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है: बड़ी तस्वीर

यह चलन अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए सुरक्षा तंत्र में एक बड़ी खामी को उजागर करता है। जहां 'अमेरिकन ड्रीम' को पेशेवर सफलता के रास्ते के रूप में पेश किया जाता है, वहीं स्थानीय पुलिस और अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग का ढांचा भारतीय छात्रों की बढ़ती संख्या के अनुपात में सुरक्षा देने में विफल हो रहा है। जब जांच रुक जाती है और संदिग्ध फरार हो जाते हैं, तो यह संदेश जाता है कि इन जिंदगियों की कोई कीमत नहीं है।

यह पैटर्न बताता है कि हम उन युवाओं की सुरक्षा में एक प्रणालीगत विफलता देख रहे हैं जो बिना किसी पर्याप्त संस्थागत समर्थन के एक विदेशी और कभी-कभी शत्रुतापूर्ण माहौल में रह रहे हैं। जब तक जवाबदेही के लिए कोई मजबूत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी तंत्र नहीं बनता, तब तक इन छात्रों की मौत एक भयावह और बार-बार दोहराई जाने वाली हकीकत बनी रहेगी जो भारतीय प्रवासियों को डराती रहेगी।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।