$30 ट्रिलियन का लक्ष्य: भारत के लिए वैश्विक स्तर पर बदलाव अब विकल्प नहीं, जरूरत है
पीयूष गोयल का कहना है कि 2047 तक $30 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों का विस्तार करना होगा
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने एक महत्वाकांक्षी रोडमैप पेश किया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय व्यापार साझेदारी और जनसांख्यिकीय लाभांश (demographic dividend) के दम पर 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
भारत के आर्थिक भविष्य का गणित अब और भी महत्वाकांक्षी हो गया है। जैसे-जैसे देश 2047 तक $30 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, रणनीति अब घरेलू खपत से हटकर वैश्विक एकीकरण की ओर केंद्रित हो रही है। 'इंडिया ग्लोबल इनोवेशन कनेक्ट' की 5वीं वार्षिक बैठक में बोलते हुए, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि विकसित राष्ट्र बनने का रास्ता अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों और दुनिया की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं के साथ रणनीतिक गठजोड़ से होकर गुजरता है।
सहयोग का तर्क
गोयल का तर्क एक सरल और व्यावहारिक अवलोकन पर आधारित है: दुनिया की उन्नत अर्थव्यवस्थाएं उम्रदराज हो रही हैं, जबकि भारत युवा प्रतिभाओं से भरा हुआ है। यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों में अनुसंधान, विकास और विनिर्माण की लागत तेजी से बढ़ रही है। इन देशों के लिए, भारत अब केवल 1.4 अरब लोगों का बाजार नहीं है; यह एक महत्वपूर्ण भागीदार है जो वह मानव पूंजी और उत्पादन क्षमता प्रदान कर सकता है, जिसे ये विकसित क्षेत्र अब किफायती तरीके से बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं।
सरकार का हालिया रिकॉर्ड भी इसे दर्शाता है, जिसमें पिछले साढ़े तीन वर्षों में 38 देशों के साथ नौ मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) किए गए हैं। ये केवल कूटनीतिक मुलाकातें नहीं हैं; बल्कि भारतीय इकोसिस्टम में पूंजी लाने और भारतीय उत्पादों के लिए समृद्ध बाजारों के द्वार खोलने के सोचे-समझे कदम हैं।
गुणवत्ता ही नई मुद्रा
सरकारी गलियारों में चर्चा अब केवल निर्यात की मात्रा से आगे बढ़ गई है। निर्यात को $2 ट्रिलियन के आंकड़े तक ले जाने के लक्ष्य के साथ, अब ध्यान 'जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट' (Zero Defect, Zero Effect) के मंत्र पर केंद्रित है—यह सुनिश्चित करना कि भारतीय उत्पाद पर्यावरणीय स्थिरता से समझौता किए बिना वैश्विक गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरें। यह बदलाव 'कम लागत' वाले टैग को हटाने और भारत को एक प्रीमियम विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए आवश्यक है।
यह क्यों मायने रखता है
यहाँ बड़ी तस्वीर एक मौलिक संरचनात्मक परिवर्तन की है। दशकों तक, भारत की आर्थिक वृद्धि काफी हद तक आंतरिक मांग से प्रेरित रही है। वर्तमान नीतिगत प्रयास एक ऐसे निर्यात-उन्मुख मॉडल की ओर स्थायी बदलाव का संकेत देते हैं, जो घरेलू कंपनियों को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए प्रेरित करता है।
यदि यह रणनीति सफल होती है, तो यह भारत के विशाल श्रम बल और उच्च-स्तरीय विनिर्माण तथा तकनीकी सेवाओं की वैश्विक मांग के बीच की खाई को पाट सकती है। हालांकि, इस $30 ट्रिलियन के विजन की सफलता केवल समझौतों पर हस्ताक्षर करने पर निर्भर नहीं करती है। इसके लिए बुनियादी ढांचे और स्थानीय विनिर्माण क्षमताओं को अपग्रेड करने के लिए निरंतर, बहु-वर्षीय प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। सरकार का मानना है कि पश्चिमी और खाड़ी देशों की जरूरतों के साथ भारतीय हितों को जोड़कर, वह दशकों तक उच्च विकास गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक पूंजी और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सुनिश्चित कर सकती है।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।