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पर्सोना की सुरक्षा: भारत में सेलिब्रिटी पहचान के लिए कानूनी लड़ाई

भारत में पर्सनालिटी राइट्स (व्यक्तित्व अधिकार): अर्थ, कानूनी ढांचा और महत्वपूर्ण फैसले

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 7 जुलाई 2026· 2 मिनट पढ़ें
पर्सोना की सुरक्षा: भारत में सेलिब्रिटी पहचान के लिए कानूनी लड़ाई
पर्सोना की सुरक्षा: भारत में सेलिब्रिटी पहचान के लिए कानूनी लड़ाई

जैसे-जैसे हाई-प्रोफाइल हस्तियां अपनी छवि को अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग से बचाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रही हैं, पर्सनालिटी राइट्स (व्यक्तित्व अधिकारों) को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे पर चर्चा तेज हो गई है।

हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट में क्रिकेटर अभिषेक शर्मा ने अपने व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू की है। यह उन सार्वजनिक हस्तियों की बढ़ती सूची में एक और नाम है जो अपनी पहचान को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अभिनेताओं से लेकर खेल सितारों तक, अपनी आवाज, छवि और हस्ताक्षर के अनधिकृत उपयोग को रोकने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप मांगने का चलन अब मुख्यधारा की कानूनी बहस बन गया है। हालांकि यह विषय सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी में, विशेष रूप से UPSC और IFoS पाठ्यक्रम में अक्सर चर्चा का केंद्र रहता है, लेकिन वास्तविक दुनिया में इसका अनुप्रयोग किसी एक कानून के बजाय अदालती फैसलों और मिसालों का एक जटिल मिश्रण है।

कानूनी परिदृश्य

भारत में वर्तमान में व्यक्तित्व अधिकारों के लिए कोई विशेष कानून नहीं है। इसके बजाय, कानूनी ढांचा न्यायिक व्याख्याओं और मौजूदा कानूनों के संयोजन पर निर्भर करता है। इसके मूल में, किसी व्यक्ति की पहचान की सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'निजता के अधिकार' (Right to Privacy) से जुड़ी है। जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत विशेषताओं—जैसे उनकी छवि या नाम—का बिना सहमति के व्यावसायिक लाभ के लिए उपयोग किया जाता है, तो अदालतें राहत देने के लिए इस संवैधानिक सुरक्षा और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) सिद्धांतों का सहारा लेती हैं।

इस सुरक्षा के दो मुख्य स्तंभ 'पब्लिसिटी का अधिकार' और 'निजता का अधिकार' हैं। पहला यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व से लाभ कमाने का विशेष अधिकार हो, जिससे तीसरे पक्ष को अनुमति के बिना किसी सेलिब्रिटी की प्रसिद्धि का उपयोग करके सामान बेचने या विज्ञापन करने से रोका जा सके। दूसरा, व्यक्ति को दखलंदाजी या अनधिकृत प्रचार से बचाता है। चूंकि कोई 'पर्सनालिटी राइट्स एक्ट' नहीं है, इसलिए न्यायपालिका पर इन अधिकारों की सीमाओं को परिभाषित करने की जिम्मेदारी है, जो महत्वपूर्ण फैसलों के जरिए कानून का स्वरूप तय कर रही है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

मुकदमों में आई यह तेजी दर्शाती है कि भारतीय समाज बौद्धिक संपदा और डिजिटल उपस्थिति को किस नजरिए से देख रहा है। ऐसे दौर में जहां डीपफेक, एआई-जनित छवियां और सोशल मीडिया विज्ञापन आम हैं, किसी व्यक्ति के 'ब्रांड' का मूल्य पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। कानूनी प्रणाली के लिए चुनौती यह है कि वह व्यक्ति के अपनी पहचान को नियंत्रित करने के अधिकार और जनहित, व्यंग्य व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाए।

हम देख रहे हैं कि न्यायिक हस्तक्षेप प्रवर्तन का प्राथमिक उपकरण बनता जा रहा है। जैसा कि टॉपर और कानूनी विशेषज्ञ अक्सर बताते हैं, जब तक संसद कोई व्यापक विधेयक नहीं लाती, तब तक ये अदालती फैसले ही व्यावहारिक कानून के रूप में काम करते हैं। औपचारिक कानून के अभाव में, हम एक ऐसे संक्रमण काल में हैं जहां अदालतें यह तय कर रही हैं कि सेलिब्रिटी का स्वामित्व कहां खत्म होता है और सार्वजनिक चर्चा कहां शुरू होती है। जैसे-जैसे डिजिटल पहचान की व्यावसायिक हिस्सेदारी बढ़ रही है, आने वाले समय में ऐसी और भी हाई-प्रोफाइल याचिकाएं देखने को मिलेंगी।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।