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कुणाल घोष ने ऋतব্রত पर साधा निशाना, 'रचनात्मक' विपक्ष की भूमिका पर दिया जोर

कुणाल घोष | ‘बालिश चाटा राजनीति नहीं करता’! ऋतব্রত पर कुणाल का तीखा हमला

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 18 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
कुणाल घोष ने ऋतব্রত पर साधा निशाना, रचनात्मक विपक्ष की भूमिका पर दिया जोर
कुणाल घोष ने ऋतব্রত पर साधा निशाना, रचनात्मक विपक्ष की भूमिका पर दिया जोर

तृणमूल नेता ने विधानसभा की रणनीतियों में एक बड़े बदलाव का संकेत दिया है। उन्होंने अपने खेमे को 'गुटबाजी' की राजनीति से दूर करते हुए विपक्ष से जवाबदेही की मांग की है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा के पहले बजट सत्र के बाद गलियारों में हलचल तेज थी, लेकिन असली गहमागहमी कुणाल घोष और शोभनदेव चट्टोपाध्याय की प्रेस वार्ता के दौरान देखने को मिली। एक तीखी आलोचना करते हुए, घोष ने अपनी राजनीतिक शैली और ऋतব্রত बंद्योपाध्याय की शैली के बीच एक स्पष्ट लकीर खींच दी। उन्होंने मशहूर अंदाज में कहा कि वह 'बालिश चाटा' (चाटुकारिता) वाली राजनीति में विश्वास नहीं रखते।

घोष की ये टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये विधायी ढांचे के भीतर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पहचान को फिर से परिभाषित करने का एक सोची-समझी कोशिश है। यह जोर देकर कि उनके समूह को मुख्यमंत्री से मिलने के लिए 'रेंगने' की जरूरत नहीं है और उन्हें मुख्यमंत्री द्वारा अलग जगह दी गई है, घोष एक गरिमापूर्ण स्वायत्तता का रुख अपना रहे हैं। उन्होंने सीधे तौर पर विपक्ष के नेता पर निशाना साधते हुए इसे 'पिछले दरवाजे' से की जाने वाली राजनीति करार दिया।

एक नया, 'रचनात्मक' विपक्षी रुख

इस राजनीतिक संदेश का मूल 'रचनात्मक विपक्ष' की ओर झुकाव है। घोष ने तर्क दिया कि नई सरकार को काम करने के लिए समय दिया जाना चाहिए, लेकिन साथ ही उन्होंने फेरीवालों को हटाने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अपनी नाराजगी भी जताई। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया है कि प्रशासन बुलडोजर का इस्तेमाल बंद करेगा, और TMC इस वादे के लिए सरकार को जवाबदेह ठहराएगी।

यह बयानबाजी दोहरे उद्देश्य को पूरा करती है: यह पार्टी को फेरीवालों के अधिकारों जैसे मुद्दों पर एक प्रहरी के रूप में कार्य करने की अनुमति देती है, जबकि साथ ही खुद को अन्य विपक्षी गुटों की कथित अराजकता से अलग करती है। घोष ने प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया और विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा पर राज्यपाल की टिप्पणियों को निशाना बनाया। उन्होंने राज्यपाल को चुनौती दी कि वे ऋतব্রত बंद्योपाध्याय के खिलाफ कार्रवाई करें, यह सुझाव देते हुए कि यदि राजभवन कानून के शासन को लेकर गंभीर है, तो उसे उन लोगों के खिलाफ कदम उठाना चाहिए जिनका आचरण जनता की नजर में संदिग्ध रहा है।

यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर

यह टकराव राज्य के अस्थिर राजनीतिक परिदृश्य में एक मोड़ का संकेत है। खुद को 'आम आदमी' के प्रतिनिधि के रूप में पेश करके और अपने प्रतिद्वंद्वियों के 'गुटबाजी' वाले व्यवहार की आलोचना करके, घोष सड़क की राजनीति के नैरेटिव को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। यहाँ महत्व केवल नेताओं के बीच व्यक्तिगत दुश्मनी का नहीं है; बल्कि यह इस बारे में है कि विधानसभा में नैतिक उच्चता किसके पास है।

जैसे-जैसे राज्य एक नए विधायी चक्र की ओर बढ़ रहा है, जनता उम्मीद कर सकती है कि कुणाल घोष की राजनीति और अधिक आक्रामक होगी, जो प्रदर्शनकारी जवाबदेही पर केंद्रित होगी। जबकि विपक्ष अभी भी बिखरा हुआ है—CPM, कांग्रेस और अन्य अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं—TMC खुद को 'रचनात्मक' आलोचक की प्राथमिक आवाज के रूप में स्थापित कर रही है, यह सुनिश्चित करते हुए कि विपक्ष में रहते हुए भी उनकी छाप स्थानीय बांग्ला समाचारों में बनी रहे।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।