ग्राम पंचायत खुली बैठकें: पीएम आवास योजना के लाभार्थियों के चयन का नया मोर्चा
जगदीपुर एवं पहसा में खुली बैठक कर आवास के पात्रों की हुई जांच
उत्तर प्रदेश में स्थानीय प्रशासन अब लाभार्थियों के सत्यापन की शक्ति को गांव के चौपाल तक ले आया है, ताकि त्रुटियों को खत्म किया जा सके और यह सुनिश्चित हो कि वास्तव में जरूरतमंदों को ही आवास मिले।
इस सप्ताह की शुरुआत में जगदीपुर और पहसा की ग्राम पंचायत बैठकों का दृश्य किसी शांत प्रशासनिक औपचारिकता से कोसों दूर था। जैसे ही अधिकारियों ने प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के लिए नवीनतम सर्वेक्षण सूची से नाम पढ़ना शुरू किया, माहौल तनावपूर्ण हो गया। जगदीपुर में, कई निवासियों—जिनमें वे लोग भी शामिल थे जिन्होंने अपने जीवनसाथी को खो दिया है—ने तुरंत आपत्ति जताई और दावा किया कि सभी पात्रता मानदंडों को पूरा करने के बावजूद उन्हें अनुचित तरीके से सूची से बाहर कर दिया गया। पहसा में स्थिति और भी अधिक अस्थिर थी, जहां पिछले सर्वेक्षण की तुलना में सत्यापन सूची से 32 नाम गायब थे, जिससे ग्रामीणों ने सार्वजनिक रूप से तीखे सवाल पूछे।
सार्वजनिक जांच की ओर यह बदलाव केवल कुछ गांवों तक सीमित नहीं है। चित्रकूट और जौनपुर जैसे जिलों में, प्रशासन 2024 के 'आवास प्लस' सर्वेक्षण के लिए लाभार्थियों की सूची को अंतिम रूप देने के लिए खुली बैठकें अनिवार्य कर रहा है। लाखों परिवारों के सिर पर पक्की छत का सपना टिका होने के कारण, यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है। अकेले चित्रकूट में 65,000 से अधिक परिवारों की जांच की जा रही है, जबकि जौनपुर में आवेदकों की संख्या 1.63 लाख से अधिक है।
पारदर्शिता की ओर एक कदम
चयन प्रक्रिया को सरकारी कार्यालयों से निकालकर ग्राम सभा तक लाने का कदम पारदर्शिता बढ़ाने का एक सोची-समझी कोशिश है। अधिकारियों को जमीनी हकीकत की जांच करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं: क्या आवेदक के पास पहले से पक्का घर है? क्या वे सरकार द्वारा निर्धारित आर्थिक मानदंडों को पूरा करते हैं? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-आधारित डेटा का ग्रामीणों की गवाही के साथ मिलान करके, राज्य का लक्ष्य अयोग्य लोगों को बाहर करना और उन जरूरतमंदों को शामिल करना है जो डिजिटल सर्वेक्षणों में छूट गए थे।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह प्रशासनिक बदलाव कल्याणकारी वितरण में होने वाली खामियों को कम करने का एक व्यापक प्रयास है। जब पात्रता का निर्धारण बंद कमरों में होता है, तो डेटा प्रविष्टि की त्रुटियां या मानवीय चूक अक्सर वर्षों तक ठीक नहीं हो पातीं। इन निर्णयों को सार्वजनिक पटल पर लाकर, सरकार अनिवार्य रूप से ऑडिट प्रक्रिया का एक हिस्सा समुदाय को सौंप रही है। हालांकि इन बैठकों में अक्सर 'गमागमी' (तीखी बहस) होती है, लेकिन ये शिकायतों के निवारण के लिए एक जरूरी माध्यम भी हैं। यदि इसे सफलतापूर्वक प्रबंधित किया जाता है, तो यह विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण भविष्य की ग्रामीण कल्याण योजनाओं के लिए एक मानक बन सकता है, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि 'आवास' केवल कागजों पर न रहकर वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचे।
हालांकि, चुनौती इसके क्रियान्वयन में बनी हुई है। हालिया बैठकों में जैसा देखा गया, प्रारंभिक सर्वेक्षण सूची और गांव की वास्तविक जरूरतों के बीच बड़ा अंतर है। स्थानीय अधिकारियों के लिए, जून के अंत तक सूची को अंतिम रूप देने की समय सीमा के साथ, आने वाले कुछ सप्ताह इस बात की परीक्षा होंगे कि वे सरकारी दिशानिर्देशों और जमीनी फीडबैक के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं। अंतिम सूची की सत्यता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि ये अधिकारी पीछे छूट गए लोगों के विरोध को कैसे संभालते हैं।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।