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जयपुर के दो चेहरे: डिजिटल शिकायतों पर प्रशासन की सक्रियता और अनदेखी का सच

जयपुर में एक क्लिक पर खुली प्रशासन की नींद: टूटी पाइप लाइन ठीक, सुधरी स्ट्रीट लाइट; शहर के कई इलाकों में अब भी बदहाली का आलम।

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 25 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
जयपुर के दो चेहरे: डिजिटल शिकायतों पर प्रशासन की सक्रियता और अनदेखी
जयपुर के दो चेहरे: डिजिटल शिकायतों पर प्रशासन की सक्रियता और अनदेखी

जहाँ डिजिटल प्लेटफॉर्म कुछ समस्याओं का तुरंत समाधान करा रहे हैं, वहीं राजस्थान की राजधानी के बड़े हिस्से आज भी प्रशासनिक उपेक्षा के चक्र में फंसे हुए हैं।

जयपुर की व्यस्त सड़कों पर, किसी नागरिक समस्या के समाधान और महीनों की परेशानी के बीच का फासला अक्सर सिर्फ एक 'क्लिक' का होता है। दैनिक भास्कर की हालिया रिपोर्ट बताती है कि प्रशासनिक कार्रवाई अब डिजिटल विजिबिलिटी (डिजिटल पहुंच) पर निर्भर होती जा रही है। जब शिव वाटिका या भवानी नगर के निवासियों ने भास्कर समाधान प्लेटफॉर्म पर टूटी पानी की पाइपलाइनों और खराब स्ट्रीट लाइटों की शिकायत की, तो प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई की। नगर निगम की उपायुक्त मनीषा यादव को इस तत्परता के लिए 'स्टार ऑफिसर' का दर्जा मिला, जो यह साबित करता है कि जब मामला सुर्खियों में आता है, तो नौकरशाही की नींद खुल जाती है।

बुनियादी ढांचे में डिजिटल खाई

हालाँकि, शासन के इस 'प्रतिक्रियाशील' मॉडल ने शहर में एक गहरी असमानता पैदा कर दी है। जहाँ कुछ चुनिंदा इलाकों में तेजी से काम हो रहे हैं, वहीं अन्य क्षेत्र बदहाली की ओर धंस रहे हैं। आदर्श नगर जैसे इलाकों में निवासी अधूरे पड़े प्रोजेक्ट्स का खामियाजा भुगत रहे हैं। स्थानीय निवासी सुनील दायमा बताते हैं कि ओल्ड कोतवाली इलाके में सड़कें एक महीने से खुदी पड़ी हैं, जिससे राहगीर टूटी सीवर लाइनों और उफनते चैंबरों के बीच से गुजरने को मजबूर हैं। यह एक निराशाजनक सच्चाई है: प्रशासन काम करने में सक्षम है, लेकिन तभी जब कोई समस्या सार्वजनिक और डिजिटल हेडलाइन बन जाए।

खामोशी की कीमत

उपेक्षा का यह पैटर्न केवल टूटी सड़कों तक सीमित नहीं है। भंबाला के गोवर्धन नगर में योगेश कुमार बताते हैं कि कचरा जमा हो रहा है क्योंकि हफ्तों से नालियों की सफाई नहीं हुई है। वहीं, बरवा कॉलोनी के मारुति नगर में लोग अंधेरे में रहने को मजबूर हैं क्योंकि स्ट्रीट लाइटें कई दिनों से खराब हैं। इन इलाकों में महिलाओं और बच्चों के लिए सूर्यास्त के बाद घर से निकलना भी डर का सबब बन गया है। स्थानीय सुपरवाइजरों से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद, इन शिकायतों पर केवल चुप्पी ही हाथ लगी है।

यह क्यों मायने रखता है: 'स्पॉटलाइट' गवर्नेंस का जाल

यह चलन इस बात का संकेत है कि नागरिक सेवाओं के प्रबंधन में एक चिंताजनक बदलाव आया है। जब प्रशासन केवल पब्लिक 'क्लिक' या मीडिया के दबाव पर काम करने लगे, तो सेवा का मानक एक अधिकार न रहकर केवल 'सबसे ऊंची आवाज' का इनाम बन जाता है। यह बुनियादी ढांचे का एक ऐसा पदानुक्रम बनाता है जहाँ केवल 'ट्रेंडिंग' समस्याओं का समाधान होता है, और शांत व उपेक्षित इलाके अनिश्चित काल तक कष्ट झेलते रहते हैं। जब तक सिस्टम में सक्रिय और व्यवस्थित रखरखाव की व्यवस्था नहीं होगी, जयपुर में सुविधासंपन्न और उपेक्षित इलाकों के बीच की खाई और चौड़ी होती जाएगी। वास्तविक सुशासन के लिए नागरिकों को बुनियादी स्वच्छता और सुरक्षा दिलाने हेतु किसी सोशल मीडिया पोस्ट के ट्रेंड होने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।