निर्वाचन सदन में विडंबना: जिस CEC को TMC ने हटाने की मांग की थी, अब वही तय करेंगे पार्टी का भविष्य
कभी ममता ने की थी CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग, अब वही करेंगे TMC के सिंबल पर फैसला
तृणमूल कांग्रेस में मची आंतरिक बगावत के बीच, बागी नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग पहुंचा है, जिससे पार्टी का भविष्य अब CEC ज्ञानेश कुमार के हाथों में आ गया है।
नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में अक्सर किस्मत के अजीब मोड़ देखने को मिलते हैं, लेकिन भारतीय चुनाव आयोग में आज जो हो रहा है, वह बेहद चौंकाने वाला है। बागी TMC नेता और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार को आयोग के मुख्यालय पहुंचा। उनका मकसद? अपनी ही पार्टी के भीतर यथास्थिति को औपचारिक रूप से चुनौती देना, जिससे चुनाव आयोग यह तय करने के लिए मजबूर हो गया है कि तृणमूल कांग्रेस की कमान किसके हाथ में रहेगी।
यह समय विडंबनाओं से भरा है। कुछ समय पहले तक, TMC विपक्ष की उन सबसे मुखर आवाजों में से एक थी जो चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग कर रही थी। विधानसभा चुनावों के दौरान, पार्टी ने न केवल उनकी भूमिका की आलोचना की, बल्कि संसद में उनके खिलाफ महाभियोग की याचिकाएं तक चलवाईं। आज, राजनीति का पहिया पूरा घूम चुका है। जिस अधिकारी को वे कभी कुर्सी से हटाना चाहते थे, अब वही यह तय करने के लिए अधिकृत हैं कि कौन सा गुट—नेतृत्व या बागी—पार्टी के आधिकारिक चुनाव चिन्ह को अपने पास रखेगा।
'सिंबल' के लिए जंग
BJP ने इस खींचतान का फायदा उठाने में देर नहीं की। पार्टी नेता केया घोष ने इस विडंबना पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह आपसी कलह विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि पार्टी के भारी-भरकम वित्तीय भंडार पर नियंत्रण के लिए है। घोष ने टिप्पणी की, "वे उन्हें हटाने की मांग कर रहे थे, और अब, अपनी वैधता के लिए उन्हें उन्हीं के कार्यालय पर निर्भर रहना पड़ रहा है," उन्होंने इस संघर्ष को "वोट और नोट" की लड़ाई करार दिया।
हालांकि आजतक और द लल्लनटॉप जैसे मीडिया संस्थानों ने चुनाव आयोग की हालिया कार्रवाई पर चर्चा की है, लेकिन पश्चिम बंगाल के बागियों की यह याचिका इस कहानी में एक नया मोड़ ले आई है। चुनाव आयोग के लिए चुनौती यह है कि वह "विभाजन" और "बगावत" के बीच के कानूनी बारीकियों को कैसे सुलझाता है। इस कानूनी जांच का मुख्य आधार आंतरिक दस्तावेजों और सदस्यों के हलफनामों के जरिए प्रत्येक गुट की ताकत को सत्यापित करने की ECI की शक्ति है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
इस याचिका का परिणाम पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा असर डालेगा। यदि आयोग बागी गुट को मान्यता देता है, तो इससे राज्य की सत्ताधारी पार्टी के संसाधनों और कैडर के प्रबंधन में बड़ा बदलाव आ सकता है। अदालती ड्रामे से परे, यह घटना भारतीय राजनीति के एक पुराने चलन को उजागर करती है: पार्टियां जब सत्ता में होती हैं तो संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाती हैं, लेकिन जब आंतरिक दरारें पड़ती हैं, तो उन्हीं संस्थाओं की शरण में पहुंच जाती हैं।
बागी गुट का यह कदम लोकतांत्रिक सुधार की दिशा में एक ईमानदार कोशिश है या TMC की पकड़ को कमजोर करने की एक चाल, यह तो ECI ही तय करेगा। जैसे-जैसे पैनल बनर्जी की टीम द्वारा सौंपी गई याचिका की समीक्षा कर रहा है, सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पार्टी को मान्यता देने की स्थापित प्रक्रियाओं को बिना किसी पूर्वाग्रह के लागू किया जाएगा, ताकि पार्टी के चुनाव चिन्ह की विरासत एक राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत फैसला बनी रहे।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।