तमिलनाडु में हॉर्स-ट्रेडिंग के आरोपों से सियासी हलचल: सेंथिल बालाजी के खिलाफ लुकआउट नोटिस पर TVK और DMK आमने-सामने
TVK और DMK के बीच हॉर्स-ट्रेडिंग को लेकर तीखी बयानबाजी; सेंथिल बालाजी को जारी लुकआउट नोटिस पर स्टालिन और DMK के शीर्ष नेता खामोश

तमिलनाडु में जैसे-जैसे राजनीतिक पारा चढ़ रहा है, विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोपों और 180 करोड़ रुपये की कथित साजिश की पुलिस जांच ने राज्य की सत्ता के गलियारों में गतिरोध पैदा कर दिया है।
तमिलनाडु का राजनीतिक रणक्षेत्र अब बेहद अस्थिर हो गया है। सत्ताधारी TVK और विपक्षी DMK के बीच हॉर्स-ट्रेडिंग के आरोपों को लेकर तीखी तकरार चल रही है। विधायकों के असंतोष की जो दबी-दबी चर्चाएं शुरू हुई थीं, वे अब एक बड़े संकट में बदल गई हैं। TVK विधायकों ने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि उन्हें सरकार छोड़ने के लिए भारी-भरकम प्रलोभन दिए गए थे।
दावों से पुलिस समन तक
तनाव तब और बढ़ गया जब TVK के श्रीवैकुंठम विधायक ने आरोप लगाया कि पूर्व DMK मंत्री सेंथिल बालाजी के एक सहयोगी ने उनसे संपर्क किया और पाला बदलने के लिए लालच दिया। यह मामला 29 जून को उत्तंगराई विधायक एन. इलैयाराजा द्वारा दर्ज कराई गई औपचारिक शिकायत के बाद शुरू हुआ, जिसने पुलिस जांच की प्रक्रिया तेज कर दी है। अधिकारी अब लगभग 180 करोड़ रुपये की उस कथित साजिश की जांच कर रहे हैं, जिसे कथित तौर पर सत्ताधारी विधायकों को तोड़ने के लिए रखा गया था।
जैसे-जैसे जांच का दायरा बढ़ रहा है, पुलिस की टीमें संदिग्धों की तलाश में करूर, तिरुचिरापल्ली, कोयंबटूर और बेंगलुरु में छापेमारी कर रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस ने सेंथिल बालाजी के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया है। हाल ही में उनके रामेश्वरपट्टी स्थित पैतृक आवास पर समन चस्पा किया गया, जिसमें पूर्व मंत्री और उनके भाई को 6 जुलाई को पूछताछ के लिए पेश होने का निर्देश दिया गया है।
खामोशी और रणनीति
जहां TVK लगातार DMK पर राज्य सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगा रही है, वहीं विपक्षी खेमे की प्रतिक्रिया में एक अजीब सी खामोशी है। एम.के. स्टालिन और DMK के अन्य शीर्ष नेता सेंथिल बालाजी को जारी लुकआउट नोटिस पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं और उन्होंने खरीद-फरोख्त के आरोपों पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की है। इसके विपरीत, DMK ने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया है कि वे हॉर्स-ट्रेडिंग की जांच की आड़ में राजनीतिक विरोधियों को डराने के लिए सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर रहे हैं।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
यह टकराव राज्य की राजनीतिक संस्कृति में एक खतरनाक बदलाव को दर्शाता है, जहां अब सरकार की स्थिरता नीतिगत बहसों के बजाय वित्तीय आरोपों के जरिए तय की जा रही है। यदि पुलिस जांच 180 करोड़ रुपये के बड़े दावे के समर्थन में ठोस सबूत पेश करने में विफल रहती है, तो इसे राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में देखा जाएगा। वहीं, अगर आरोप साबित होते हैं, तो यह 'चेकबुक पॉलिटिक्स' के उस दौर का संकेत है जो जनता द्वारा दिए गए जनादेश को कमजोर कर सकता है। फिलहाल, यह गतिरोध शासन के कामकाज से ध्यान भटका रहा है और दोनों पक्ष इस हाई-प्रोफाइल विवाद में अगले कानूनी कदम का इंतजार कर रहे हैं।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।