विधानसभा से स्थानीय निकाय तक: तमिलनाडु की जमीनी राजनीति पर विजय की TVK की नजर
स्थानीय निकाय चुनाव में DMK को चुनौती: पर्दे के पीछे से बिसात बिछा रही TVK - किसकी होगी जीत?
जैसे-जैसे तमिझगा वेत्री कझगम (TVK) का ध्यान राज्य विधानसभा से हटकर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की ओर केंद्रित हो रहा है, DMK के साथ बढ़ता वर्चस्व का संघर्ष तमिलनाडु में राजनीतिक तनाव के एक नए युग का संकेत दे रहा है।
तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य एक बार फिर उथल-पुथल के लिए तैयार है। मुख्यमंत्री विजय की तमिझगा वेत्री कझगम (TVK) के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार की वास्तविकता में अभी राज्य ठीक से ढला भी नहीं था कि आठ महीने के भीतर होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों की चर्चा शुरू हो गई है। तनाव अब केवल विधायी बहसों तक सीमित नहीं है; यह नगर निगम कार्यालयों तक पहुंच गया है, जहां नए मुख्यमंत्री की तस्वीर का होना प्रशासनिक गतिरोध का कारण बन गया है।
करूर और तिरुनेलवेली की हालिया घटनाएं इस बढ़ती बेचैनी को रेखांकित करती हैं। करूर में, पूर्व नेताओं के साथ मुख्यमंत्री की तस्वीर लगाने के प्रयास ने हंगामा खड़ा कर दिया। वहीं, तिरुनेलवेली में एक मेयर ने कथित तौर पर अपनी आधिकारिक सीट छोड़ दी ताकि उन्हें उस दीवार के नीचे काम न करना पड़े जहां एम. करुणानिधि और एम.के. स्टालिन की तस्वीरों के बीच विजय की तस्वीर लगाई गई थी। यह घर्षण केवल प्रतीकात्मक नहीं है; यह सत्ता के लिए एक गहरे संघर्ष को दर्शाता है क्योंकि DMK को लग रहा है कि उसका पारंपरिक प्रशासनिक प्रभाव एक नई राजनीतिक व्यवस्था से चुनौती का सामना कर रहा है।
विघटन की रणनीति
स्थानीय निकायों की लड़ाई को दोनों खेमे 'करो या मरो' के मुकाबले के रूप में देख रहे हैं। जहां अन्ना अरिवलयम से संचालित DMK अपने आंतरिक मतभेदों को सुलझाने और अपने मुख्य आधार को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, वहीं TVK अधिक आक्रामक भर्ती रणनीति अपना रही है। सूत्रों का कहना है कि विजय की टीम सक्रिय रूप से उन असंतुष्ट स्थानीय नेताओं की पहचान कर रही है—जिन्हें DMK ने दरकिनार कर दिया था या जिन्हें पहले नामांकन में नजरअंदाज किया गया था—ताकि एक ऐसा जमीनी ढांचा तैयार किया जा सके जो सत्तारूढ़ दल के लंबे समय से चले आ रहे प्रभुत्व को चुनौती दे सके।
बयानों की धार तेज हो गई है। मंत्री अधव अर्जुन ने सार्वजनिक रूप से चुनौती देते हुए DMK को आगामी स्थानीय निकाय चुनाव में एक भी मेयर पद जीतने की चुनौती दी है, और इसे वर्तमान राजनीतिक ताकत की अंतिम परीक्षा बताया है। TVK के मंत्रियों जैसे एन. आनंद का दावा है कि पार्टी का लक्ष्य सभी 234 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल करना है, जिससे स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य विधानसभा-स्तरीय प्रभाव को शहरी और ग्रामीण स्थानीय शासन पर पूर्ण नियंत्रण में बदलना है।
बड़ी तस्वीर
यह मेयर की कुर्सियों के लिए केवल एक मुकाबला नहीं है; यह तमिलनाडु की राजनीति का एक संरचनात्मक पुनर्गठन है। DMK, जो वर्तमान में सत्ता पर अपनी एकल पकड़ खोने के बाद के प्रभावों से जूझ रही है, TVK सरकार को 'रील्स प्रशासन' के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है और इसके उदय को सोशल मीडिया का प्रभाव बताकर खारिज कर रही है। हालांकि, आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं। हाल के दौर में भारी मतदान के बावजूद, मतदाता सूची में बड़े बदलाव—लाखों नाम हटाए जाने और नए, युवा मतदाताओं के जुड़ने से—ने एक ऐसा अप्रत्याशित माहौल बना दिया है जहां पारंपरिक पार्टी वफादारी अब सफलता की गारंटी नहीं है।
DMK के लिए चुनौती दोहरी है: उन्हें एक आक्रामक नए प्रवेशी का सामना करना है और साथ ही उस गठबंधन को भी एकजुट रखना है जिसे TVK लगातार लुभा रही है। विजय के लिए, अपनी सरकार को वैध बनाने का रास्ता सड़कों और पंचायतों से होकर गुजरता है। यदि TVK वार्ड स्तर पर अपनी संगठनात्मक क्षमता साबित कर लेती है, तो वह केवल सचिवालय की बागडोर संभालने वाली पार्टी से बदलकर राज्य की प्रशासनिक मशीनरी पर वास्तविक नियंत्रण रखने वाली पार्टी बन जाएगी।
बदलाव पर नजर
व्यापक तमिल राजनीतिक विमर्श वर्तमान में इन रणनीतिक चालों से प्रभावित है। वनइंडिया और समयम जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की रिपोर्ट एक सामान्य विषय को दर्शाती हैं: DMK नुकसान का आकलन करने के लिए आंतरिक सर्वेक्षण कर रही है, जबकि स्वतंत्र विश्लेषक 'सत्ता विरोधी' लहर की ओर इशारा कर रहे हैं जो स्थानीय चुनाव मशीनरी को दुरुस्त न करने पर घातक साबित हो सकती है। चाहे यह स्थापित दलों के लिए चेतावनी हो या सुधार का आह्वान, अगले कुछ महीने इस बात से परिभाषित होंगे कि ये दल स्थानीय स्तर के सत्ता दलालों की बदलती निष्ठाओं को कितनी प्रभावी ढंग से संभालते हैं। जैसा कि पत्रकार आंडल प्रियदर्शिनी ने उल्लेख किया है, चुनाव के बाद की गतिशीलता एक ऐसी वास्तविकता को उजागर करती है जहां शासन और चुनावी राजनीति के बीच की रेखाएं पूरी तरह धुंधली हो गई हैं।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।