राज्यसभा चुनाव: मध्य प्रदेश और गुजरात में BJP का दबदबा, कानूनी विवादों ने बढ़ाई हलचल
राज्यसभा चुनाव | मध्य प्रदेश और गुजरात में BJP की निर्विरोध जीत; राजस्थान में कांग्रेस को मिली 1 सीट
दो प्रमुख राज्यों में निर्विरोध जीत के साथ BJP ने उच्च सदन में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है, जबकि मध्य प्रदेश में नामांकन रद्द होने को लेकर शुरू हुआ कानूनी विवाद गरमा गया है।
इस हफ्ते राज्यसभा की तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब BJP ने मध्य प्रदेश और गुजरात में एकतरफा जीत दर्ज की। मैदान में कोई विपक्षी उम्मीदवार न होने के कारण, पार्टी के प्रत्याशियों को बिना किसी मतदान के ही निर्वाचित घोषित कर दिया गया। 18 जून को होने वाली चुनावी प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई और राज्य कोटे की सभी सीटों पर सत्ताधारी दल का कब्जा हो गया।
मध्य प्रदेश में रजनीश अग्रवाल, तरुण चुघ और महेश केवट की जीत के बीच कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होना चर्चा का विषय बना रहा। रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने तेलंगाना में लंबित एक कानूनी मामले की जानकारी छिपाने का हवाला देते हुए उनका नामांकन खारिज कर दिया। इसके बाद कांग्रेस ने चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। आज हुई सुनवाई के दौरान, नटराजन का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को गलत बताया, जिसके बाद कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई कल के लिए तय कर दी है।
गुजरात में बदलाव और राजस्थान का समीकरण
गुजरात की स्थिति उच्च सदन में BJP की बढ़ती ताकत को स्पष्ट करती है। राजू शुक्ला, मानसिंह परमार, मुकेश राठवा और जितेंद्र कंजारिया के चुनाव के साथ, अब राज्य के सभी 11 राज्यसभा सदस्य BJP से हैं। इसका मतलब यह है कि कम से कम 2029 तक उच्च सदन में गुजरात से कांग्रेस का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होगा, जो राज्य में पार्टी के घटते जनाधार का स्पष्ट संकेत है।
वहीं, राजस्थान में स्थिति कुछ अलग रही। वहां तीन उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए, लेकिन सीटों का बंटवारा हुआ। जहां BJP ने सतीश पूनिया और अल्का गुर्जर के जरिए दो सीटें हासिल कीं, वहीं कांग्रेस एक सीट बचाने में कामयाब रही और नीरज डांगी राज्यसभा पहुंचने में सफल रहे।
यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर
ये परिणाम एक बड़े चलन को दर्शाते हैं: राज्यसभा का धीरे-धीरे एक ऐसे सदन में बदलना, जहां विधानसभा स्तर पर संख्या बल ही विधायी नियंत्रण का आधार बन जाता है। जब नामांकन रद्द हो जाते हैं या चुनाव निर्विरोध होते हैं, तो संसदीय प्रक्रिया पूरी तरह से मतदान से दूर हो जाती है। मीनाक्षी नटराजन से जुड़ा कानूनी विवाद नामांकन चरण की बढ़ती अनिश्चितता को उजागर करता है, जहां तकनीकी खामियां राजनीतिक अस्तित्व के लिए नया रणक्षेत्र बन गई हैं। विपक्ष के लिए चुनौती अब केवल सीटें जीतना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि वे चुनाव लड़ने के लिए कानूनी रूप से पात्र बने रहें।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।