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चार साल बाद अशोक गहलोत का दावा: बीजेपी ने कन्हैया लाल हत्याकांड का राजनीतिक फायदा उठाया

'बीजेपी ने वोटों के लिए कन्हैया लाल की हत्या का इस्तेमाल किया': अशोक गहलोत का आरोप, चार साल बाद भी न्याय अधूरा

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 27 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
चार साल बाद अशोक गहलोत का दावा: बीजेपी ने कन्हैया लाल हत्याकांड का राजनीतिक फायदा उठाया
चार साल बाद अशोक गहलोत का दावा: बीजेपी ने कन्हैया लाल हत्याकांड का राजनीतिक फायदा उठाया

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 2022 के उदयपुर हत्याकांड पर फिर से बहस छेड़ दी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि एनआईए (NIA) के अधिकार क्षेत्र में होने के बावजूद इस मामले की सुनवाई ठप पड़ी है।

28 जून, 2022 को उदयपुर के दर्जी कन्हैया लाल की नृशंस हत्या ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया था। यह स्थानीय घटना देखते ही देखते सांप्रदायिक तनाव का राष्ट्रीय मुद्दा बन गई। चार साल बाद भी जयपुर की अदालत में सन्नाटा पसरा है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अब बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा है कि न्यायिक प्रक्रिया को जानबूझकर धीमा किया गया है, जबकि बीजेपी ने इस घटना का इस्तेमाल अपने चुनावी नैरेटिव को मजबूत करने के लिए किया था।

अधर में लटका ट्रायल

गहलोत ने उन प्रक्रियागत खामियों की ओर इशारा किया है जिन्होंने न्याय की राह रोकी है। उनका दावा है कि लगभग 180 गवाहों में से केवल कुछ ही गवाहों से पूछताछ हो पाई है। मामले में प्रशासनिक स्तर पर भी बड़ी लापरवाही बरती गई, जिसमें एक समय ऐसा भी आया जब पीठासीन न्यायाधीश के तबादले के कारण छह महीने तक अदालत में कोई सुनवाई नहीं हुई। हालांकि एनआईए ने हत्या के कुछ घंटों के भीतर ही जांच अपने हाथ में ले ली थी, लेकिन गहलोत का तर्क है कि 'डबल इंजन' सरकार के तहत मुकदमे की धीमी गति उस तत्परता के विपरीत है, जिसका वादा एजेंसी ने जांच शुरू करते समय किया था।

बीजेपी को लगातार कांग्रेस के दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जो यह मानती है कि अगर जांच राज्य पुलिस के पास रहती, तो कानूनी परिणाम कहीं अधिक तेजी से सामने आते। गहलोत के हालिया बयानों ने पीड़ित परिवार की हताशा को उजागर किया है, जो खुद को हाई-प्रोफाइल मामले और धीमी न्यायिक प्रक्रिया के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं।

मुआवजे और बयानबाजी की राजनीति

कानूनी देरी के अलावा, पीड़ित परिवार के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया को लेकर भी बहस तेज हो गई है। गहलोत ने उन दावों को खारिज किया है कि उनकी सरकार ने परिवार की मदद नहीं की। उन्होंने याद दिलाया कि उनकी सरकार ने 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया और कन्हैया लाल के दोनों बेटों को सरकारी नौकरी दी। उन्होंने बीजेपी पर विधानसभा चुनावों के दौरान 'पांच लाख बनाम पचास लाख' का झूठा नैरेटिव गढ़ने का आरोप लगाया, ताकि जनता की भावनाओं को प्रभावित किया जा सके। बीजेपी ने इन आरोपों को हमेशा नकारा है।

इसके अलावा, कांग्रेस नेता ने यह सनसनीखेज आरोप भी लगाया है कि कुछ आरोपी बीजेपी से जुड़े हुए हैं, जिसे पार्टी ने पहले ही सिरे से खारिज कर दिया है। गृह मंत्री और अन्य शीर्ष नेताओं के राजस्थान दौरों के दौरान इस मामले पर चुप्पी साधे रखने को विपक्ष चुनावी हथकंडा करार दे रहा है। उनका मानना है कि यह मुद्दा न्याय के लिए नहीं, बल्कि केवल चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया था।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है

यह विवाद भारतीय राजनीति के एक कड़वे सच को उजागर करता है: संवेदनशील आपराधिक मामलों का चुनावी हथियार में बदल जाना। जब कोई जघन्य अपराध स्थानीय पुलिस से एनआईए जैसी केंद्रीय एजेंसी के पास जाता है, तो अक्सर इसे 'त्वरित न्याय' की दिशा में कदम बताया जाता है। हालांकि, जब न्याय में देरी होती है, तो जवाबदेही का संकट पैदा हो जाता है। केंद्र और राज्य के बीच जिम्मेदारी का खेल, पीड़ित की पहचान और मुआवजे का राजनीतिकरण यह दर्शाता है कि कन्हैया लाल का मामला अब केवल संदिग्धों का ट्रायल नहीं, बल्कि राजस्थान में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन गया है। जैसे-जैसे मामला खिंचता जा रहा है, यह देरी जनता के भरोसे को कम कर रही है और एक पीड़ित परिवार उस फैसले का इंतजार कर रहा है जो अब और भी दूर होता दिख रहा है।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।