मेरठ और उत्तराखंड के संस्थानों में करोड़ों की छात्रवृत्ति घोटाले पर ईडी का शिकंजा
मेरठ: भाजपा नेता की यूनिवर्सिटी पर ईडी का छापा, 13.83 करोड़ की संपत्ति कुर्क, छात्रवृत्ति से जुड़ा मामला
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति फंड की व्यवस्थित हेराफेरी की गहन जांच के बाद तीन निजी संस्थानों की 13.83 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक निर्णायक कार्रवाई के बाद मेरठ और उत्तराखंड के गलियारों में हलचल मच गई है। एक बड़ी कार्रवाई करते हुए, एजेंसी ने तीन निजी शैक्षणिक संस्थानों की कुल 13.83 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की है। यह केवल एक सामान्य ऑडिट नहीं है; यह उस जटिल वित्तीय जाल के खिलाफ एक सोची-समझी चोट है, जिसने कथित तौर पर सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए छात्रवृत्ति (scholarship) प्रणाली का दुरुपयोग किया था।
डिंपल सिरोही की एक शुरुआती रिपोर्ट के बाद गति पकड़ने वाली यह जांच, SC और ST छात्रों के लिए निर्धारित पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति फंड के कथित दुरुपयोग पर केंद्रित है। इस घोटाले का दायरा चौंकाने वाला है: संघीय जांचकर्ताओं ने पाया कि हरिद्वार जिला समाज कल्याण कार्यालय में जमा किए गए 6,208 दावों में से लगभग 2,895 छात्रवृत्ति दावे पूरी तरह से फर्जी थे।
आरोपों का जाल
अब जांच के दायरे में आए संस्थानों में मेरठ का महावीर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रुड़की का मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी और हरिद्वार का रुड़की इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट/मेडिकल साइंसेज शामिल हैं। जांच के अनुसार, इन कॉलेजों ने अपनी संबंधित प्रबंधन समितियों और ट्रस्टों के साथ मिलकर व्यवस्थित रूप से वंचित छात्रों के लिए निर्धारित फंड को निशाना बनाया।
वित्तीय जांच से पता चलता है कि इन संस्थानों को वितरित किए गए 27.98 करोड़ रुपये में से 19.74 करोड़ रुपये सीधे संस्थागत खातों में डाले गए। इस चल रही जांच में ईडी का यह छठा कुर्की आदेश है, जो यह दर्शाता है कि जब शैक्षिक धोखाधड़ी की स्थानीय जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाती, तो केंद्रीय एजेंसियां किस तरह सक्रिय हो रही हैं।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है: एक बड़ी तस्वीर
यह मामला भारत की सामाजिक कल्याण वितरण प्रणाली में एक चिंताजनक संरचनात्मक खामी को उजागर करता है। जब निजी संस्थान—जो अक्सर राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों द्वारा चलाए जाते हैं—छात्रवृत्ति पोर्टलों को अपना 'पर्सनल एटीएम' समझने लगते हैं, तो इससे न केवल सरकारी खजाने को नुकसान होता है, बल्कि हजारों छात्रों के लिए सामाजिक उत्थान का वादा भी पटरी से उतर जाता है।
यह कोई अकेली घटना नहीं है। हजारों फर्जी पहचानों से जुड़े इस व्यवस्थित घोटाले से पता चलता है कि स्थानीय समाज कल्याण विभागों और संस्थानों के बीच सत्यापन की प्रक्रिया विफल रही है। जैसे-जैसे ईडी मनी लॉन्ड्रिंग के इस जाल की जांच कर रही है, इसके परिणाम इन परिसरों से बाहर भी महसूस किए जाएंगे। व्यापक निहितार्थ स्पष्ट है: सरकार इन फर्जी दावों के 'मूल स्रोत' को सत्यापित करने के लिए अधिक आक्रामक और फोरेंसिक दृष्टिकोण अपना रही है, जो यह संकेत देता है कि सरकारी अनुदान तक आसान और बिना जांच वाली पहुंच का दौर अब खत्म हो रहा है।
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अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।