खाड़ी में कूटनीति: एस जयशंकर ने अमेरिका-ईरान वार्ता को पुनर्जीवित करने के लिए कतर की सराहना की
जयशंकर ने कतर के प्रधानमंत्री से मुलाकात की, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता के प्रयासों की तारीफ की
जैसे-जैसे अमेरिका और ईरान बातचीत की मेज पर लौट रहे हैं, भारत के विदेश मंत्री ने पश्चिम एशियाई तनाव को कम करने में दोहा की शांत 'शटल डिप्लोमेसी' (shuttle diplomacy) पर जोर दिया है।
पश्चिम एशियाई कूटनीति के हाई-स्टेक माहौल में, अक्सर सबसे शांत कमरे ही सबसे बड़े परिणाम देते हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस सप्ताह दोहा की अपनी महत्वपूर्ण यात्रा संपन्न की, जहां उन्होंने कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी के साथ व्यापक चर्चा की। हालांकि आधिकारिक एजेंडे में ऊर्जा, व्यापार और लोगों के बीच संबंधों जैसे द्विपक्षीय मुद्दे शामिल थे, लेकिन इस यात्रा का मुख्य केंद्र अमेरिका-ईरान संघर्ष के बदलते समीकरण थे।
कतर के मध्यस्थता प्रयासों के लिए जयशंकर की सार्वजनिक प्रशंसा दोहा के बढ़ते प्रभाव की एक महत्वपूर्ण स्वीकृति है। जब इस साल की शुरुआत में वाशिंगटन और तेहरान के बीच नाजुक संघर्ष विराम टूटने के कगार पर था, तब कतर की निरंतर और शांत सक्रियता ने ही बातचीत को जीवित रखा। हालांकि शुरुआती उम्मीदें अन्य क्षेत्रीय शक्तियों पर टिकी थीं, लेकिन दोहा की विवेकपूर्ण कार्यशैली और गहरी पैठ ने अंततः दोनों पक्षों को कूटनीतिक रास्ते पर वापस ला खड़ा किया।
11 जुलाई की राह
11 जुलाई के लिए निर्धारित आगामी तकनीकी वार्ता, दो सप्ताह पहले हस्ताक्षरित 'इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उस समझौते ने दोनों देशों को ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं पर एक व्यापक रूपरेखा तैयार करने के लिए 60 दिनों का समय दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिरता—जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है—सभी हितधारकों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है, जिसमें भारत भी शामिल है, जिसका इन जलमार्गों को सुरक्षित रखने में निहित स्वार्थ है।
हालांकि जुलाई के मध्य में होने वाली इन चर्चाओं के स्थान को अभी अंतिम रूप दिया जाना बाकी है, लेकिन तटस्थ जमीन की ओर वापसी यह बताती है कि अमेरिका और ईरान अपने पुराने विवादों को सुलझाने के लिए एक पेशेवर माहौल की तलाश में हैं। यह बातचीत हो रही है, इसका एक बड़ा श्रेय उस 'शटल डिप्लोमेसी' को जाता है, जिसकी जयशंकर ने कतर के प्रधानमंत्री के साथ अपनी बैठक के दौरान सराहना की।
यह क्यों मायने रखता है
नई दिल्ली के लिए, ये घटनाक्रम केवल एक दूर के संघर्ष की पृष्ठभूमि नहीं हैं। खाड़ी में भारत की रणनीतिक उपस्थिति एक स्थिर और अनुमानित क्षेत्रीय व्यवस्था पर निर्भर करती है। कतर के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर, जो पश्चिम और तेहरान दोनों का विश्वास प्राप्त मध्यस्थ है, भारत खुद को एक ऐसे व्यावहारिक हितधारक के रूप में स्थापित कर रहा है जो टकराव के बजाय तनाव कम करने का समर्थन करता है।
बड़ी तस्वीर पश्चिम एशिया में एक नई, बहुध्रुवीय कूटनीतिक संरचना के उभरने की है। एक ही मध्यस्थ पर निर्भर रहने के दिन लद गए हैं; इसके बजाय, हम एक 'नीश डिप्लोमेसी' (niche diplomacy) देख रहे हैं जहां कतर जैसे छोटे और फुर्तीले देश अपनी तटस्थता का लाभ उठाकर पूर्ण पैमाने पर सैन्य संघर्ष को रोकने का काम कर रहे हैं। जयशंकर की यात्रा भारत के उस इरादे को रेखांकित करती है कि वह इन बैक-चैनल प्रक्रियाओं से जुड़ा रहे, ताकि ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी कल्याण के हमारे हितों की रक्षा हो सके, भले ही अमेरिका और ईरान अपने दशकों पुराने गतिरोध से जूझ रहे हों।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।