दिग्विजय सिंह के 'सीट चोरी' के आरोपों से न्यायपालिका और चुनाव आयोग पर विवाद
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टलने पर दिग्विजय सिंह ने साधा निशाना; भाजपा ने की कार्रवाई की मांग।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन खारिज होने के बाद न्यायपालिका और चुनाव आयोग की मिलीभगत का गंभीर आरोप लगाया है।
भोपाल के सत्ता के गलियारों में कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह के तीखे हमले के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। मीनाक्षी नटराजन का राज्य सभा नामांकन खारिज होने के बाद, सिंह ने राज्य और केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट पर 'मिलीभगत से सीट चोरी' करने का आरोप लगाया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब शीर्ष अदालत ने नटराजन की याचिका पर सुनवाई टाल दी, जिससे चुनाव प्रक्रिया की समय सीमा समाप्त होने के बाद यह चुनौती बेअसर हो गई।
इसका असर तुरंत देखने को मिला। भोपाल के मंत्री सारंग ने दिग्विजय पर पलटवार करते हुए इसे न्यायपालिका का अपमान बताया। भाजपा ने कड़ा रुख अपनाते हुए कांग्रेस नेता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है और तर्क दिया है कि सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक कीचड़ में घसीटना लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए एक खतरनाक मिसाल है।
'सीट चोरी' के आरोप
इस विवाद के केंद्र में मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी का खारिज होना है, जिन्हें कांग्रेस एक गांधीवादी और बेदाग छवि वाली नेता बताती है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे सहित पार्टी नेताओं ने भाजपा और चुनाव आयोग के बीच स्पष्ट 'जुगलबंदी' का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन 'मामूली तकनीकी खामियों' के आधार पर खारिज कर दिया गया, जबकि भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को अपने दस्तावेजों की गलतियां सुधारने की छूट दी गई।
जब तक कानूनी दांव-पेच किसी नतीजे पर पहुंचते, चुनाव आयोग ने भाजपा उम्मीदवारों रजनीश अग्रवाल, तरुण चुघ और महेश केवट को जीत का प्रमाण पत्र सौंप दिया। इन तीनों सीटों के निर्विरोध चुने जाने के बाद भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है, जबकि कांग्रेस इसे 'चुराई गई जीत' बता रही है।
यह क्यों मायने रखता है
यह प्रकरण केवल एक नामांकन के बारे में नहीं है, बल्कि विपक्ष और संवैधानिक संस्थाओं के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है। जब एक वरिष्ठ राजनेता सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के समय पर सवाल उठाकर 'सुनियोजित' परिणाम का आरोप लगाता है, तो यह संकेत देता है कि चुनाव का मैदान अब मतपेटियों से निकलकर अदालतों तक पहुंच गया है। चुनाव आयोग और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का चलन यह दर्शाता है कि अब हर प्रक्रियात्मक अस्वीकृति को राजनीतिक हमले के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा मुद्दा बन गया है; उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने का संकल्प लिया है। यह एक निरंतर आंदोलन बनेगा या केवल एक स्थानीय राजनीतिक झड़प, यह इस पर निर्भर करेगा कि पार्टी इस नैरेटिव को कैसे आगे बढ़ाती है। हालांकि, बयानों की तीव्रता यह बताती है कि संसदीय मर्यादा की जगह अब आक्रामक और टकराव वाली राजनीति ले रही है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।