डिजिटल शिकायतें और मानहानि: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेलिब्रिटी विवाद पर क्यों लगाई लगाम
सलमान खान ने जीती कानूनी लड़ाई, कोर्ट ने पड़ोसी को विवादित वीडियो हटाने का आदेश दिया: 'कोई भी किसी को भी...'

बॉम्बे हाईकोर्ट ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग पर कड़ी फटकार लगाते हुए सलमान खान से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे संपत्ति विवाद में मानहानि वाली सामग्री को हटाने का आदेश दिया है।
पनवेल फार्महाउस के आसपास की शांत गलियां वर्षों से अशांत रही हैं। बॉलीवुड स्टार सलमान खान के लिए, उनके पड़ोसी केतन कक्कड़ के खिलाफ कानूनी लड़ाई में आखिरकार एक बड़ा मोड़ आया है, जहां बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑनलाइन जहर उगलने वालों पर लगाम लगाने के लिए हस्तक्षेप किया है। मामले के मूल में संपत्ति का विवाद है, लेकिन अदालत का यह ताजा आदेश सिर्फ जमीन के बारे में नहीं है—यह सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत हमलों की सीमा के बारे में एक सख्त चेतावनी है।
यह विवाद कक्कड़ द्वारा किए गए उन दावों से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि अभिनेता ने पर्यावरण नियमों का उल्लंघन किया है और उनकी निजी संपत्ति तक पहुंच को बाधित किया है। स्थानीय अधिकारियों से मनचाहा परिणाम न मिलने के बाद, कक्कड़ ने अपनी शिकायतें YouTube और Twitter पर डाल दीं। 2019 और 2020 के आसपास सामने आए ये पोस्ट खान द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे का आधार बने। निचली अदालत द्वारा अभिनेता को तत्काल राहत देने से इनकार करने के बाद, मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां न्यायपालिका ने अब एक स्पष्ट रेखा खींच दी है।
डिजिटल जिम्मेदारी का सवाल
हालिया सुनवाई के दौरान, जस्टिस शर्मिला देशमुख ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि सोशल मीडिया सार्वजनिक ट्रायल के लिए खुली छूट देता है। अदालत ने टिप्पणी की, "कोई भी व्यक्ति किसी के बारे में, चाहे वह आम नागरिक हो या सेलिब्रिटी, केवल उसे बदनाम करने के लिए वीडियो अपलोड नहीं कर सकता।" बेंच ने तीखे सवाल किए कि वर्षों पुरानी सामग्री आज भी क्यों चल रही है, और सुझाव दिया कि जनहित के नाम पर व्यक्तिगत रंजिश निकालना डिजिटल बुनियादी ढांचे का दुरुपयोग है।
विवादित वीडियो को हटाने का अदालत का निर्देश एक बढ़ती हुई न्यायिक सोच को पुख्ता करता है: डिजिटल प्लेटफॉर्म नागरिक संपत्ति विवादों को सुलझाने के लिए उचित जगह नहीं हैं। न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि यदि जमीन या पर्यावरण से संबंधित वास्तविक मुद्दे थे, तो सही रास्ता संबंधित अधिकारियों के पास जाना था, न कि किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए निरंतर ऑनलाइन अभियान चलाना।
बड़ी तस्वीर
यह मामला इस बात का संकेत है कि भारतीय अदालतें अब ऑनलाइन भाषण को कैसे देख रही हैं। वर्षों से, इंटरनेट एक अनियमित चौराहे की तरह काम कर रहा है जहां आरोप—अक्सर बिना किसी आधार के—अपनी प्रासंगिकता से अधिक समय तक जीवित रहते हैं। इस सामग्री को हटाने का आदेश देकर, अदालत सबूतों का बोझ वापस आरोपी पर डाल रही है, और यह स्पष्ट कर रही है कि किसी प्लेटफॉर्म तक "पहुंच" का मतलब परेशान करने का अधिकार नहीं है।
जैसे-जैसे हम अधिक हाई-प्रोफाइल हस्तियों और निजी नागरिकों को अपने विवादों को डिजिटल दायरे में ले जाते हुए देख रहे हैं, यह फैसला एक आवश्यक अंकुश के रूप में काम करता है। यह बताता है कि वायरल कंटेंट के दौर में भी, कानून जनमत या सोशल मीडिया 'लाइक्स' में कोई दिलचस्पी नहीं रखता। क्या यह ऑनलाइन विमर्श के लिए एक स्थायी मिसाल कायम करेगा, यह देखना बाकी है, लेकिन फिलहाल संदेश स्पष्ट है: आभासी दुनिया कानूनविहीन जगह नहीं है, और डिजिटल मानहानि के परिणाम बहुत वास्तविक होते हैं।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।