Politicalpedia
राष्ट्रीय

दिल्ली हाई कोर्ट ने मानहानि विवाद में अंजना ओम कश्यप और खान सर को मध्यस्थता का निर्देश दिया

हाई कोर्ट ने पत्रकार अंजना ओम कश्यप द्वारा खान सर के खिलाफ दायर मानहानि मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 2 जुलाई 2026· 2 मिनट पढ़ें
दिल्ली हाई कोर्ट ने अंजना ओम कश्यप और खान सर को मानहानि विवाद में मध्यस्थता के लिए निर्देशित किया
दिल्ली हाई कोर्ट ने अंजना ओम कश्यप और खान सर को मानहानि विवाद में मध्यस्थता के लिए निर्देशित किया

कोर्ट ने दोनों पक्षों को आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की सलाह दी है और शिक्षक को पत्रकार के बच्चों से जुड़ी जानकारी सोशल मीडिया से हटाने का निर्देश दिया है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने टीवी टुडे नेटवर्क की मैनेजिंग एडिटर अंजना ओम कश्यप और लोकप्रिय शिक्षक फैसल खान, जिन्हें खान सर के नाम से जाना जाता है, के बीच चल रहे डिजिटल विवाद में हस्तक्षेप किया है। गुरुवार को पारित एक आदेश में, जस्टिस तुषार राव गेडेला ने मानहानि के इस मामले को मध्यस्थता (mediation) के लिए भेज दिया और दोनों पक्षों से सार्वजनिक चर्चा में संयम बरतने का आग्रह किया। अदालत की कार्यवाही ने एक चिंताजनक चलन को उजागर किया है, जहाँ पेशेवर आलोचनाएं अब व्यक्तिगत दायरे में प्रवेश कर रही हैं।

यह मुकदमा, जिसमें अभिनय शर्मा, बबीता त्यागी और अरविंद भदौरिया जैसे प्रमुख शिक्षक भी प्रतिवादी के रूप में शामिल हैं, सोशल मीडिया पोस्ट की एक श्रृंखला से शुरू हुआ। सुनवाई के दौरान, वादी के वकील ने गंभीर चिंता जताते हुए आरोप लगाया कि खान ने कश्यप के बच्चों के स्कूल के बारे में संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक कर दी, जिससे सुरक्षा को लेकर खतरा पैदा हो गया और परिवार को सीधे धमकियां मिलने लगीं। कोर्ट ने तुरंत कार्रवाई करते हुए शिक्षक को नाबालिगों से संबंधित सभी संदर्भ हटाने का निर्देश दिया और पत्रकार की कानूनी टीम से भी अपने क्लाइंट को संयम बरतने के लिए कहने को कहा।

यह विवाद मई के अंत में शुरू हुआ था, जब पत्रकार ने यूट्यूब पर साझा की जाने वाली सामग्री की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे। इसके बाद सोशल मीडिया पर विवादों का दौर शुरू हुआ जो कानूनी लड़ाई में बदल गया। बहस के दौरान, वादी के कानूनी प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि ये शिक्षक अपने प्लेटफॉर्म का उपयोग राजनीति पर चर्चा करने के लिए कर रहे हैं—जो उनके पेशेवर पाठ्यक्रम के दायरे से बाहर है। न्यायाधीश ने एक स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा माहौल में हर किसी की राजनीति पर राय है, उन्होंने कहा, "जिसे राजनीति के बारे में कुछ नहीं पता, वह भी राजनीति पर चर्चा करता है। राजनीति यही तो है।"

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है

यह मामला जनहित पत्रकारिता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के अनियंत्रित प्रभाव के बीच की धुंधली रेखा की याद दिलाता है। चूंकि वे भारत के युवाओं के बीच बड़ी संख्या में फॉलोअर्स रखते हैं, इसलिए इन शिक्षकों की जिम्मेदारी पर सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट की यह टिप्पणी कि "यह ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे अदालत में आना चाहिए," न्यायिक चिंता को दर्शाती है: ऑनलाइन प्रभाव का दुरुपयोग अब उस स्तर पर पहुंच गया है जहाँ यह व्यक्तियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया है। यदि यह विवाद मध्यस्थता के माध्यम से सुलझ जाता है, तो यह एक मिसाल कायम कर सकता है कि सार्वजनिक हस्तियों के बीच डिजिटल असहमति को कानूनी लड़ाई में बदलने से पहले कैसे प्रबंधित किया जाए।

दोनों पक्ष एक वरिष्ठ मध्यस्थ की मदद से समझौता शर्तों पर विचार करने के लिए सहमत हो गए हैं, और कार्यवाही जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है। फिलहाल, कोर्ट ने 'कूलिंग-ऑफ' अवधि का आदेश दिया है, जो यह संकेत देता है कि असहमति का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्तिगत सीमाओं को पार किया जाए या परिवारों को खतरे में डाला जाए। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी, जिसमें बातचीत की प्रगति पर नजर रखी जाएगी।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।