कीमोथेरेपी दवाओं की भारी किल्लत से कैंसर मरीजों की जान पर बनी
कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी दवाओं का संकट गहराया

प्लेटिनम-आधारित आवश्यक दवाओं की कमी ने अस्पतालों और परिवारों को संकट में डाल दिया है, जिससे इलाज की निरंतरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
पूरे भारत में मेडिकल सप्लाई चेन में गहराते संकट ने कैंसर मरीजों को भारी मुसीबत में डाल दिया है। एम्स (AIIMS) दिल्ली जैसे प्रमुख संस्थानों से लेकर निजी ऑन्कोलॉजी केंद्रों तक, हर जगह सिस्प्लैटिन (Cisplatin) और कार्बोप्लेटिन (Carboplatin) की भारी कमी की खबरें आ रही हैं। ये दोनों दवाएं फेफड़ों, स्तन, सर्वाइकल और एसोफैगल कैंसर सहित कई तरह के कैंसर के इलाज में आधारभूत मानी जाती हैं। दवाओं का स्टॉक खत्म होने की कगार पर है और चिकित्सा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति अब केवल लॉजिस्टिक्स की समस्या नहीं, बल्कि मरीजों की जान के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है।
दवाओं की कमी की मानवीय कीमत
इन जीवन रक्षक दवाओं की कमी ने इलाज की प्रक्रिया को एक दैनिक संघर्ष में बदल दिया है। सर गंगाराम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्याम अग्रवाल ने स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि कई अस्पतालों में अब 48 घंटे से भी कम का स्टॉक बचा है। नतीजतन, इन दवाओं को खोजने का बोझ अब मरीजों और उनके परिवारों पर आ गया है, जिन्हें अपनी अगली खुराक पाने के लिए फार्मेसियों और वितरकों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
ऑन्कोलॉजिस्ट के लिए, इलाज के मानक प्रोटोकॉल का पालन न कर पाना एक कठिन नैतिक और नैदानिक दुविधा पैदा कर रहा है। एम्स के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. एम. डी. रे ने आगाह किया कि ये रुकावटें सिर्फ इलाज में देरी नहीं करतीं, बल्कि ये इलाज की दीर्घकालिक प्रभावशीलता को भी खतरे में डाल सकती हैं और कैंसर के दोबारा होने की आशंका को बढ़ा सकती हैं। चूंकि कई क्लिनिकल प्रोटोकॉल में इन विशिष्ट प्लेटिनम-आधारित दवाओं का कोई दूसरा विकल्प नहीं है, इसलिए डॉक्टर इलाज जारी रखने में खुद को बेबस पा रहे हैं।
बढ़ती लागत और उत्पादन की बाधाएं
उद्योग के जानकारों का मानना है कि इस कमी की जड़ में एक जटिल आर्थिक गतिरोध है। साउथ दिल्ली फार्मा के बिजनेस हेड तरुण गर्ग का कहना है कि यह समस्या पिछले एक महीने से बढ़ रही है। वे बताते हैं कि निर्माता आयातित कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का बोझ उठाने में संघर्ष कर रहे हैं। चूंकि ये जीवन रक्षक दवाएं सरकार द्वारा नियंत्रित मूल्य (प्राइस कंट्रोल) के दायरे में आती हैं, इसलिए कई निर्माताओं ने कथित तौर पर उत्पादन कम कर दिया है या पूरी तरह बंद कर दिया है। उनका तर्क है कि मौजूदा मूल्य सीमा के कारण उत्पादन करना आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह गया है।
ऐसी भी खबरें हैं कि कुछ निर्माता घरेलू मांग के बजाय निर्यात बाजार को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे देश के भीतर सीमित आपूर्ति और भी कम हो गई है। हालांकि दवा कंपनियों ने मूल्य नियंत्रण दरों में संशोधन की मांग की है, लेकिन मामला अभी भी लंबित है। जब तक उद्योग नियामक हस्तक्षेप का इंतजार कर रहा है, ऑन्कोलॉजी समुदाय एक ऐसी नाजुक सप्लाई चेन को संभालने के लिए मजबूर है जो सबसे कमजोर वर्ग की जरूरतों को पूरा करने में विफल हो रही है।
एक वैश्विक समस्या
ऑन्कोलॉजी आपूर्ति को बनाए रखने का संघर्ष केवल भारत तक सीमित नहीं है। हालिया वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि कीमोथेरेपी दवाओं की कमी विकसित देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों में भी एक आवर्ती समस्या बन गई है, जहां कई केंद्रों को आपातकालीन उपाय अपनाने पड़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिकित्सकों को सख्त रणनीति अपनानी पड़ रही है—जैसे दवाओं का स्टॉक करना, गैर-अनुबंधित आपूर्तिकर्ताओं का उपयोग करना या इलाज के उद्देश्य के आधार पर मरीजों को प्राथमिकता देना। इन प्रयासों के बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए कोई ठोस दीर्घकालिक रणनीति नहीं बनाई जाती, तब तक मरीज इन दवाओं की कमी के विनाशकारी परिणामों का सामना करते रहेंगे।
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