'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' के नैरेटिव से परे: केरल की बार नीति का असली इतिहास
'उम्मन चांडी सरकार ने बार बंद किए, यह सिर्फ एक व्हाट्सऐप कहानी है; सब कुछ बीयर पार्लर में बदल दिया गया था'
आबकारी मंत्री एम.बी. राजेश ने यूडीएफ (UDF) सरकार की शराब नीतियों को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं को चुनौती दी है। उन्होंने तर्क दिया कि उम्मन चांडी के शासनकाल में 'पूर्ण शराबबंदी' का नैरेटिव केवल एक मिथक है।
उम्मन चांडी प्रशासन की विरासत को लेकर छिड़ी राजनीतिक बहस के बीच वर्तमान आबकारी मंत्री एम.बी. राजेश ने तीखी टिप्पणी की है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए, राजेश ने इस दावे को खारिज कर दिया कि पिछली यूडीएफ सरकार ने केरल में सफलतापूर्वक बार 'बंद' किए थे। उन्होंने इसे 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' की उपज बताया—यह शब्द भारतीय राजनीतिक गलियारों में सोशल मीडिया पर फैलने वाली असत्यापित सूचनाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मंत्री ने इस बात पर निराशा जताई कि ऐसे नैरेटिव अब विधानसभा के पटल तक पहुंच गए हैं, जहां उन्हें स्थापित तथ्यों के रूप में पेश किया जा रहा है।
2014 की नीतिगत बदलाव की पड़ताल
विवाद की जड़ 2014 की आबकारी नीति में है, जिसे 'बार रिश्वत' विवाद के बीच लागू किया गया था। राजेश के अनुसार, यह कदम पूर्ण शराबबंदी के लिए कोई नैतिक अभियान नहीं था, बल्कि एक रणनीतिक राजनीतिक दांव था। उनका तर्क है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री उम्मन चांडी को वी.एम. सुधीरन के राजनीतिक दबाव का मुकाबला करने और बार लाइसेंस से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों से ध्यान भटकाने के लिए नीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा था।
हालांकि इस नीति के परिणामस्वरूप अधिकांश बार लाइसेंस रद्द कर दिए गए, लेकिन इसने 29 फाइव-स्टार होटलों को स्पष्ट रूप से छूट दे दी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने बड़े पैमाने पर रूपांतरण की प्रक्रिया को जन्म दिया: सैकड़ों प्रतिष्ठान बंद होने के बजाय बस 'रीब्रांड' हो गए।
बीयर और वाइन पार्लर में परिवर्तन
आबकारी मंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़े कथित 'शटडाउन' के बाद भी शराब के फलते-फूलते कारोबार की तस्वीर पेश करते हैं। जब उम्मन चांडी सरकार का कार्यकाल समाप्त हुआ, तब केरल में 306 बेवको (BevCo) आउटलेट्स के साथ-साथ 813 बीयर और वाइन पार्लर चल रहे थे। राजेश का तर्क है कि एलडीएफ (LDF) सरकार के बाद के कदम उदारीकरण की नीति नहीं, बल्कि एक कानूनी अनिवार्यता थे।
जब इन पूर्व बार होटलों ने थ्री-स्टार वर्गीकरण हासिल कर लिया, तो वर्तमान सरकार कानूनी रूप से उनके लाइसेंस का नवीनीकरण करने के लिए बाध्य थी। राजेश का दावा है कि वर्तमान में 896 आउटलेट्स की संख्या—जो एक दशक पहले के 813 की तुलना में है—लाइसेंसिंग का एक स्वाभाविक विकास है, न कि बाजार में 'बाढ़' जैसा कि अक्सर विपक्षी सोशल मीडिया अभियानों में सुझाया जाता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: राजनीतिक दांव
आंकड़ों को लेकर यह टकराव महज संख्या का खेल नहीं है; यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में उम्मन चांडी की विरासत को परिभाषित करने के लिए चल रहे संघर्ष को दर्शाता है। अतीत को एक 'व्हाट्सऐप कहानी' के रूप में पेश करके, सत्ताधारी गठबंधन शराब नीति पर नैरेटिव को फिर से अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है, जो केरल की राजनीति में एक स्थायी मुद्दा है।
जनता के लिए, यह एक आवर्ती पैटर्न को उजागर करता है: केरल में आधिकारिक नीतिगत बदलाव अक्सर गहन डिजिटल दुष्प्रचार अभियानों के साथ आते हैं। जैसे-जैसे ये दावे ट्रेंड कर रहे हैं, राजनीतिक ब्रांडिंग और वास्तविक प्रशासनिक इतिहास के बीच अंतर करना मतदाताओं के लिए एक महत्वपूर्ण कार्य बना हुआ है। चाहे ये बहसें केरल कौमुदी के ई-पेपर में दिखें या वायरल सोशल मीडिया फोटो गैलरी के जरिए, अंतर्निहित सच्चाई उन जटिल लाइसेंसिंग फाइलों में दबी हुई है जो शायद ही कभी राजनीतिक बयानों का हिस्सा बन पाती हैं।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।