स्क्रीन से परे: कैसे सलीम कुमार ने खेती में पाई अपनी असली दौलत
खेती ने कैसे सलीम कुमार को बनाया 'अरबपति' और मिली ममूटी की भी तारीफ

अपनी कॉमेडी के लिए मशहूर दिवंगत अभिनेता सलीम कुमार अपने पीछे न केवल सिनेमा की विरासत छोड़ गए, बल्कि मिट्टी के साथ एक गहरा और जीवन बदलने वाला जुड़ाव भी छोड़ गए।
दशकों तक, भारतीय फिल्म उद्योग सलीम कुमार को स्क्रीन के एक दिग्गज के रूप में जानता रहा, एक ऐसा कलाकार जिसकी टाइमिंग और हाजिरजवाबी ने मलयालम सिनेमा की एक पूरी पीढ़ी को परिभाषित किया। फिर भी, जो लोग उन्हें करीब से जानते थे, वे समझते थे कि उनका सबसे पसंदीदा किरदार वह था जिसे उन्होंने चकाचौंध से दूर निभाया। एक लोकप्रिय स्क्रीन आइकन से खेती के प्रति समर्पित व्यक्ति बनने का उनका सफर यह दर्शाता है कि वह प्रकृति के चक्रों को उसी सम्मान से देखते थे, जैसा कभी वे अपनी बेहतरीन कॉमेडी पंचलाइन के लिए रखते थे।
मिट्टी का दर्शन
खेती में सलीम कुमार का कदम रखना काफी अलग था, जो इस दर्शन पर आधारित था कि आर्थिक लाभ से कहीं ज्यादा जरूरी आत्म-संतुष्टि है। उन्होंने अक्सर इस बात का जिक्र किया कि खेती करना एक सृजन का कार्य है, जिसकी तुलना कहानी लिखने या फिल्म निर्देशित करने से की जा सकती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि "खेती करके कोई टाटा या अंबानी नहीं बनता," लेकिन उनका तर्क था कि इससे मिलने वाला भावनात्मक लाभ बेजोड़ है। उनके लिए, जमीन से अंकुर को बाहर निकलते देखना एक "अरबपति" जैसी संतुष्टि देता था—ऐसी दौलत जिसे पैसे से नहीं खरीदा जा सकता।
उनकी रुचि बचपन में ही जगी थी, जिसे उनके पैतृक घर के छोटे से सब्जी के बगीचे ने संवारा, जहाँ रतालू और तोरई जैसी सब्जियां रोजाना के भोजन के लिए उगाई जाती थीं। जब उनका अभिनय करियर अपने चरम पर था, तब भी उन्होंने इस सादगी भरे जीवन को बनाए रखा, क्योंकि उनका मानना था कि खेती की मेहनत उन्हें वह ऊर्जा देती है जो उनके व्यस्त पेशेवर जीवन में नहीं मिल सकती थी।
खेतों में मिला एक नैतिक आधार
खेती के जीवन के प्रति अभिनेता का नजरिया एक अप्रत्याशित स्रोत से बना: पेशेवर काम के सिलसिले में जेलों के उनके अक्सर होने वाले दौरे। इन मुलाकातों के दौरान, उन्होंने गौर किया कि कैदियों में किसानों की संख्या न के बराबर थी। इससे वे एक मजाकिया लेकिन गंभीर निष्कर्ष पर पहुंचे कि जो लोग जमीन पर मेहनत करते हैं, उनमें दूसरों को नुकसान पहुंचाने की "कला" नहीं होती। सलीम के लिए, किसान केवल भोजन का उत्पादक नहीं, बल्कि एक शांतिपूर्ण और रचनात्मक स्वभाव का संरक्षक था।
उनकी प्रतिबद्धता सिर्फ एक शौक तक सीमित नहीं थी; वे स्थानीय तकनीकों, जैसे पोक्कली खेती, के मुखर समर्थक बन गए और दूसरों को भी मिट्टी से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके समर्पण ने दिग्गज ममूटी सहित उनके साथियों का ध्यान खींचा, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से उनके प्रयासों की सराहना की। उद्योग के इन दो दिग्गजों के बीच का यह आपसी सम्मान दर्शाता है कि फिल्म बिरादरी में सलीम के कृषि प्रयासों का कितना सम्मान था।
सादगी की विरासत
सलीम कुमार का जीवन हमें याद दिलाता है कि एक कलाकार का सबसे महत्वपूर्ण योगदान अक्सर उनके व्यक्तिगत मूल्यों में निहित होता है। उनके निधन के बाद जब श्रद्धांजलि दी गई, तो ध्यान उनके दोहरे व्यक्तित्व पर रहा: एक शानदार, बेबाक टिप्पणीकार जो अपनी राजनीतिक राय रखने से नहीं डरता था, और एक विनम्र किसान जिसे अपने घर के पिछवाड़े में शांति मिलती थी।
भले ही एक छोटे से खेत का वित्तीय बही-खाता घाटा दिखा सकता है, लेकिन सलीम कुमार जीवन का एक ऐसा बैलेंस शीट छोड़ गए जिसने उनके सिद्धांत को सही साबित किया। उन्होंने इस समझ के साथ जीवन जिया कि प्रकृति को छूने और बीज से फल तक एक पौधे को पालने की खुशी, संतोष की एक ऐसी चादर प्रदान करती है जिसे कोई भी बॉक्स-ऑफिस सफलता कभी नहीं दे सकती।
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