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सुर्खियों से परे: दिल्ली हाई कोर्ट ने NewsClick केस को क्यों खारिज किया?

एक्सप्लेन: दिल्ली हाई कोर्ट ने NewsClick के खिलाफ लगे आरोपों को क्यों रद्द किया?

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 24 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
सुर्खियों से परे: दिल्ली हाई कोर्ट ने NewsClick केस को क्यों खारिज किया?
सुर्खियों से परे: दिल्ली हाई कोर्ट ने NewsClick केस को क्यों खारिज किया?

जांच एजेंसियों की अति-सक्रियता पर एक तीखी टिप्पणी करते हुए, अदालत का यह फैसला इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि भारतीय मीडिया के लिए 'ड्यू प्रोसेस' (उचित कानूनी प्रक्रिया) ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच क्यों है।

डिजिटल न्यूज़ पोर्टल्स की जांच से जुड़ी कानूनी लड़ाई फिलहाल एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक कड़े फैसले में NewsClick और उसके प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा शुरू की गई मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही को खारिज कर दिया है। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा के आदेश ने, जिसमें सरकार की कार्रवाई को 'कानून का घोर दुरुपयोग' बताया गया है, उस जांच को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है जो वर्षों से विदेशी फंडिंग में अनियमितताओं के आरोपों में उलझी हुई थी।

आरोपों का विश्लेषण

2020 में सामने आया यह मामला एक ऐसी नींव पर खड़ा था, जिसे अदालत ने बेहद कमजोर पाया। दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने यह जांच किसी पीड़ित पक्ष की शिकायत के बजाय, सोभन सिंह नामक एक मुखबिर के पत्र के आधार पर शुरू की थी। मुख्य आरोप यह था कि NewsClick ने अमेरिकी कंपनी 'वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी' से 1.5 मिलियन डॉलर की राशि को बढ़ा-चढ़ाकर शेयर वैल्यूएशन के जरिए प्राप्त किया और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) नियमों का उल्लंघन किया। जांचकर्ताओं का तर्क था कि यह डिजिटल मीडिया में विदेशी निवेश की 26% की सीमा को दरकिनार करने की एक सोची-समझी साजिश थी।

हालांकि, समयसीमा (टाइमलाइन) ही सरकारी पक्ष के लिए मुसीबत बन गई। निवेश समझौता मार्च 2018 में हुआ था और फंड एक महीने बाद प्राप्त हुआ—यानी सरकार द्वारा सितंबर 2019 में 26% FDI की सीमा लागू करने से एक साल से भी पहले। अदालत ने गौर किया कि पोर्टल ने 2017 में ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखकर FDI नियमों पर स्पष्टता मांगी थी, जो कानून को छिपकर तोड़ने के नैरेटिव के बिल्कुल विपरीत था।

यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर

यह फैसला जांच एजेंसियों की शक्तियों की सीमा तय करने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण संकेत है। कार्यवाही को 'दुर्भावनापूर्ण और मनमाना' करार देकर, अदालत ने एक अहम सिद्धांत को रेखांकित किया है: राज्य की जांच मशीनरी का इस्तेमाल स्वतंत्र पत्रकारिता को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। जब एजेंसियां ठोस सबूतों के बजाय 'कोरे दावों' पर निर्भर रहती हैं, तो वे कानूनी प्रक्रिया को उत्पीड़न का हथियार बनाने का जोखिम उठाती हैं। व्यापक मीडिया जगत के लिए, यह फैसला एक न्यायिक ढाल की तरह है, जो यह स्पष्ट करता है कि वित्तीय नियमों की मनमानी व्याख्या करके प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर नहीं किया जा सकता।

इन मामलों का खारिज होना इस बात की याद दिलाता है कि उच्च-स्तरीय वित्तीय जांच में सबूतों का बोझ कितना महत्वपूर्ण होता है। ED का मनी लॉन्ड्रिंग केस, जो 'प्रेडिकेट ऑफेंस' (मूल अपराध) पर निर्भर था, अदालत द्वारा शुरुआती पुलिस FIR में कोई आपराधिक आधार न पाने के बाद स्वतः ही ढह गया। हालांकि यह अध्याय समाप्त हो गया है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञ इस केस को एक उदाहरण के रूप में देखेंगे कि भारतीय कानूनी परिदृश्य में जांच की मजबूती मीडिया की सुर्खियों से नहीं, बल्कि जज के सामने पेश किए गए ठोस तथ्यों से मापी जाती है।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।