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बारुईपुर का खौफ: जब राजनीतिक निष्ठा न्याय की आवाज को दबा देती है

बारुईपुर मामला: क्या 'बदलाव' सिर्फ एक चुनावी विज्ञापन है? अभिनेता रिद्धि सेन ने उठाए सवाल

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 6 जुलाई 2026· 3 मिनट पढ़ें
बारुईपुर का खौफ: जब राजनीतिक निष्ठा न्याय की आवाज को दबा देती है
बारुईपुर का खौफ: जब राजनीतिक निष्ठा न्याय की आवाज को दबा देती है

अभिनेता रिद्धि सेन ने सवाल उठाया है कि क्या राजनीतिक 'बदलाव' केवल एक दिखावटी नारा है, क्योंकि बारुईपुर में एक नाबालिग की बर्बर हत्या ने जन आक्रोश की लहर पैदा कर दी है।

बारुईपुर की फिजाओं में अभी भी गहरा दुख और सन्नाटा पसरा है। 11 साल की एक बच्ची, जिसे क्रूरता की हदें पार कर छीन लिया गया, एक बोरी में मृत पाई गई। सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के इस खौफनाक मंजर ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। जैसे-जैसे इस घटना की जानकारी सामने आई, स्थानीय लोगों का दुख गुस्से में बदल गया। हालांकि अधिकारी अभी मामले की जांच कर रहे हैं, लेकिन इस घटना ने अति-पक्षपाती राजनीति के दौर में हमारी नैतिकता पर एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है।

सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखने वाले अभिनेता रिद्धि सेन ने इस जुलाई में सोशल मीडिया पर 'बदलाव' के नैरेटिव को चुनौती दी। उन्होंने तीखी आलोचना करते हुए तर्क दिया कि राजनीतिक बदलाव अक्सर चुनावी घोषणापत्रों के चमकदार पन्नों तक ही सीमित रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि भले ही सरकारें बदल जाएं, लेकिन व्यवस्था की जड़ें—जैसे कि अपराधियों को मिलने वाली छूट, जघन्य अपराधों का तुष्टीकरण और न्याय का राजनीतिकरण—आज भी जस की तस बनी हुई हैं।

सेन की हताशा का मुख्य कारण आज के दौर में 'चयनात्मक' आक्रोश है। वे कहते हैं कि आजकल अपराध को उसकी गंभीरता से नहीं, बल्कि आरोपी की राजनीतिक निष्ठा के आधार पर तौला जाता है। यदि अपराधी 'अपने' खेमे का है, तो उसे बचाने की कोशिश की जाती है; यदि वह विपक्षी गुट का है, तो उसे राजनीतिक अभियान का केंद्र बना दिया जाता है। उनका तर्क है कि इसने सार्वजनिक नैतिकता को एक दिखावटी कला बना दिया है, जिसमें न्याय की सबसे बड़ी बलि दी जाती है।

बारुईपुर के स्थानीय निवासी इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं। उनका आरोप है कि राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण शुरुआती जांच प्रभावित हुई। हालांकि इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन व्यापक रूप से यह चर्चा है कि एक स्थानीय भाजपा नेता ने संदिग्धों को पुलिस हिरासत से छुड़ाने में हस्तक्षेप किया। ये आरोप कानून की अदालत में टिकेंगे या नहीं, यह अलग बात है, लेकिन ये एक खतरनाक सच्चाई को उजागर करते हैं: राज्य के कई हिस्सों में कानून के शासन से ज्यादा राजनीतिक वफादारी का वजन भारी है।

बड़ी तस्वीर: रसूख के साये में न्याय

यह घटना भारतीय राज्य राजनीति के उस पैटर्न को दर्शाती है, जहां जवाबदेही की मांग अक्सर सत्ता के समीकरणों में दब जाती है। जब बारुईपुर जैसी भयावह घटना दो राजनीतिक दलों के बीच रस्साकशी का मुद्दा बन जाती है, तो पीड़िता का परिवार एक बड़े सत्ता संघर्ष में महज एक फुटनोट बनकर रह जाता है। त्रासदी यह है कि हम इस खौफ के प्रति असंवेदनशील हो गए हैं, और हमारा पूरा ध्यान इस बात पर रहता है कि किस पार्टी को इस घटना से राजनीतिक फायदा या नुकसान होगा।

वास्तविक प्रणालीगत बदलाव के लिए हमें उस 'हम बनाम वे' की मानसिकता से ऊपर उठना होगा, जो आज हमारी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करती है। यदि न्याय की मशीनरी—स्थानीय पुलिस स्टेशन से लेकर अदालत तक—राजनीतिक दबाव के आगे झुकती रही, तो 'बदलाव' का वादा एक खोखला नारा ही बना रहेगा। गिरफ्तारियां और अदालती फैसले जरूरी हैं, लेकिन अगर सामाजिक अनुबंध राजनीतिक संरक्षण से बंधा रहेगा, तो ये नाकाफी हैं। जब तक जवाबदेही के प्रति हमारे नजरिए में बुनियादी बदलाव नहीं आता, तब तक आक्रोश और उदासीनता का यह चक्र अगली त्रासदी के साथ फिर से दोहराया जाता रहेगा।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।