राजनीतिक शून्यता: थोल. थिरुमावलवन ने AIADMK की चुप्पी पर उठाए सवाल
अधिविमु (AIADMK) के भीतर क्या चल रहा है? नेता क्यों चुप हैं? थिरुमावलवन ने पूछा
VCK नेता ने खरीद-फरोख्त और राजनीतिक अस्थिरता की अफवाहों के बीच AIADMK की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं।
चेन्नई के राजनीतिक गलियारों में हलचल है, लेकिन किसी बड़ी नीतिगत घोषणा या रैली के कारण नहीं। इसके बजाय, ध्यान एक ऐसी चुप्पी पर केंद्रित है जो बहुत कुछ कह रही है। VCK प्रमुख थोल. थिरुमावलवन ने आज AIADMK नेतृत्व पर निशाना साधते हुए पूछा कि जब पार्टी के भीतर बिखराव और बाहर से तोड़-फोड़ की खबरें जोर पकड़ रही हैं, तो पार्टी के शीर्ष नेता इतने खामोश क्यों हैं?
चेन्नई में पत्रकारों से बात करते हुए, उन्होंने कहा कि इस बढ़ते तनाव का मुख्य कारण 'तमिलगा वेट्री कड़गम' (TVK) द्वारा की जा रही कथित 'खरीद-फरोख्त' है। थिरुमावलवन ने दो टूक कहा: AIADMK नेतृत्व गुस्से में क्यों नहीं है? उस पार्टी की ओर से सार्वजनिक आक्रोश क्यों नहीं दिख रहा है, जिसे कथित तौर पर भीतर से खोखला किया जा रहा है?
जवाबदेही का सवाल
तमिलनाडु की राजनीति पर नजर रखने वालों के लिए, थिरुमावलवन की आवाज में निराशा साफ देखी जा सकती है। उन्होंने इस विडंबना की ओर इशारा किया कि मीडिया संकट के असली कारणों से सवाल करने के बजाय बार-बार सहयोगी दलों से प्रतिक्रिया मांग रहा है। उन्होंने प्रेस को चुनौती देते हुए कहा, "अगर खरीद-फरोख्त के आरोप हैं, तो आप जिम्मेदार पार्टियों से सवाल क्यों नहीं पूछ रहे हैं?"
उन्होंने तर्क दिया कि यदि TVK वास्तव में AIADMK की इकाइयों को अपने में मिलाने की कोशिश कर रहा है, तो मीडिया का लोकतांत्रिक कर्तव्य है कि वह उस पार्टी को जवाबदेह ठहराए। क्या यह नैतिक है? क्या यह राजनीतिक नैतिकता है? उनका मानना है कि इन्हीं सवालों से बचा जा रहा है। उन जैसे सहयोगियों पर ध्यान केंद्रित करके, मीडिया असल मुद्दे से किनारा कर रहा है।
यह क्यों मायने रखता है: सत्ता का दृश्य
यहाँ बड़ी तस्वीर राज्य में बदलती सत्ता की गतिशीलता की है। मुख्य विपक्षी दल AIADMK फिलहाल रक्षात्मक मुद्रा में है। राज्यपाल को केवल ज्ञापन सौंपकर और अपनी शिकायतों को जनता के बीच न ले जाकर, पार्टी नैरेटिव की लड़ाई हार रही है। थिरुमावलवन की आलोचना एक महत्वपूर्ण कमजोरी को उजागर करती है: जब कोई बड़ा राजनीतिक दल अपने ही बिखराव के खिलाफ सार्वजनिक आक्रोश दिखाने में विफल रहता है, तो यह मतदाताओं को संकेत देता है कि पार्टी या तो समझौता कर चुकी है या नेतृत्वहीन है।
यह केवल AIADMK के आंतरिक स्वास्थ्य के बारे में नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि राजनीतिक परिदृश्य कैसे फिर से तैयार हो रहा है। यदि पार्टी चुप रहती है, तो उसके कमजोर पड़ने का खतरा है, जिससे TVK जैसे नए खिलाड़ी अपनी शर्तें थोप सकते हैं। AIADMK महासचिव कार्यालय की चुप्पी को राजनीतिक विश्लेषक या तो एक रणनीतिक 'प्रतीक्षा करो और देखो' की नीति मान रहे हैं, या फिर चिंताजनक रूप से, अपने कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण खोना मान रहे हैं।
सीधे टकराव का आह्वान
थिरुमावलवन का संदेश स्पष्ट है: यदि AIADMK को लगता है कि उसे तोड़ा जा रहा है, तो उसे यह कहना होगा। उसे जनता के पास जाना होगा और मांग करनी होगी कि यदि अवैध खरीद-फरोख्त के आरोप सही हैं, तो अधिकारी, जिनमें राज्यपाल भी शामिल हैं, हस्तक्षेप करें। जब तक AIADMK नेतृत्व अपनी आवाज नहीं उठाता, तब तक राजनीतिक शून्यता केवल अटकलों और कार्यकर्ताओं के लगातार पलायन से ही भरी जाएगी।
मतदाता के लिए, यह एक भ्रमित करने वाला माहौल बनाता है। जब कोई पार्टी अपने क्षेत्र की रक्षा करने से इनकार करती है, तो यह एक ऐसा शून्य पैदा करता है जहां 'खरीद-फरोख्त' ही राजनीतिक हलचल का एकमात्र स्पष्टीकरण बन जाता है। थिरुमावलवन का हस्तक्षेप एक आईने की तरह है, जो मीडिया और जनता को यह सोचने पर मजबूर करता है कि एक प्रमुख विपक्षी पार्टी अपने संभावित पतन का मूकदर्शक बने रहने का विकल्प क्यों चुन रही है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।