शी जिनपिंग का प्योंगयांग दौरा: उत्तर कोरिया पर चीन अपनी पकड़ फिर मजबूत करने की कवायद में
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग किम जोंग उन के साथ अहम बातचीत के लिए उत्तर कोरिया पहुंचे

जैसे-जैसे चीनी राष्ट्रपति उत्तर कोरिया की एक दुर्लभ यात्रा की तैयारी कर रहे हैं, किम जोंग उन के साथ यह शिखर सम्मेलन बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में अपना प्रभाव फिर से हासिल करने की एक रणनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
प्योंगयांग में सोमवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दो दिवसीय दौरे के साथ ही कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। सात वर्षों में यह उनकी पहली यात्रा है। यह दौरा बीजिंग-प्योंगयांग संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की एक सोची-समझी चाल है। हालांकि आधिकारिक एजेंडा गोपनीय रखा गया है, लेकिन इस दौरे का समय महज संयोग नहीं है। शी का यह दौरा बीजिंग में व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई उच्च-स्तरीय बैठकों के ठीक बाद हो रहा है, जो अपने अस्थिर पड़ोसी पर चीन के पारंपरिक प्रभाव को फिर से मजबूत करने की एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
सालों से चीन और उत्तर कोरिया के संबंध अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। हालांकि चीन उत्तर कोरिया की आर्थिक जीवनरेखा बना हुआ है—अक्सर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को नजरअंदाज कर शासन को सहारा देता रहा है—लेकिन हाल के दिनों में यह समीकरण थोड़ा कमजोर हुआ है। किम जोंग उन ने मॉस्को की ओर रुख किया है, जहां वे यूक्रेन युद्ध के लिए रूसी सैन्य और आर्थिक समर्थन के बदले गोला-बारूद और सैनिक मुहैया करा रहे हैं। क्रेमलिन की ओर झुकाव बीजिंग की नजरों से छिपा नहीं है, और शी की इस यात्रा को प्योंगयांग को यह याद दिलाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है कि उसका असली संरक्षक कौन है।
रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का बिसात
इस दांव का असर कोरियाई प्रायद्वीप से कहीं आगे तक है। उत्तर कोरिया पर अपनी पकड़ मजबूत करके, शी अनिवार्य रूप से अमेरिका के साथ आगामी बातचीत के लिए अपनी स्थिति को और धार दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा पूर्वोत्तर एशिया में चीन की नेतृत्वकारी भूमिका का सार्वजनिक प्रदर्शन है। सितंबर में डोनाल्ड ट्रम्प के साथ प्रस्तावित बैठक से पहले, शी यह दिखाना चाहते हैं कि प्योंगयांग में स्थिरता की चाबी वाशिंगटन के पास नहीं, बल्कि उनके पास है। यदि शी अप्रत्याशित किम को सफलतापूर्वक नियंत्रित कर लेते हैं, तो उन्हें अमेरिकी प्रशासन के साथ अपने व्यापक और अक्सर तनावपूर्ण संबंधों में महत्वपूर्ण लाभ मिलेगा।
यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देश अपनी आपसी रक्षा संधि की 65वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। हालांकि, इस यात्रा के संकेत बताते हैं कि यह पुरानी यादों से ज्यादा आधुनिक शक्ति प्रदर्शन के बारे में है। सियोल की इवा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लीफ-एरिक ईस्ली का कहना है कि शी जैसा नेता महज रस्म अदायगी के लिए ऐसी यात्रा नहीं करता। इस यात्रा का उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के लिए दीर्घकालिक परिणाम तय करना है, खासकर जब बीजिंग और प्योंगयांग दोनों ही पश्चिम के साथ अलग-अलग और गहरे टकराव में उलझे हुए हैं।
यह क्यों मायने रखता है
बड़ी तस्वीर नियंत्रण और एकीकरण की है। भारत के लिए, चीन, रूस और उत्तर कोरिया के बीच गहराता गठबंधन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जटिल सुरक्षा वातावरण पैदा करता है। यदि बीजिंग प्योंगयांग को सफलतापूर्वक अपने प्रभाव क्षेत्र में वापस लाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को दरकिनार करने वाले सत्तावादी गुटों के और अधिक एकजुट होने का संकेत है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए, परमाणु निरस्त्रीकरण या किम के साथ कूटनीति की बहाली की उम्मीदें धूमिल होती दिख रही हैं क्योंकि ये शासन आपस में और करीब आ रहे हैं। शी सिर्फ एक सहयोगी से मिलने नहीं जा रहे हैं; वे एक लकीर खींच रहे हैं, खुद को एक ऐसे क्षेत्र में अनिवार्य 'गेटकीपर' के रूप में स्थापित कर रहे हैं जहां अमेरिका का प्रभाव लगातार कम हो रहा है।
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