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बगावत की सुगबुगाहट: टीएमसी का कथित पत्र और बंगाल में गहराता राजनीतिक संकट

पश्चिम बंगाल की राजनीति: 19 टीएमसी सांसदों के हस्ताक्षर वाला कथित पत्र पार्टी में टूट की अटकलों को हवा दे रहा है

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 12 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
बगावत की सुगबुगाहट: टीएमसी का कथित पत्र और बंगाल में गहराता राजनीतिक संकट
बगावत की सुगबुगाहट: टीएमसी का कथित पत्र और बंगाल में गहराता राजनीतिक संकट

19 सांसदों के हस्ताक्षरों वाला एक रहस्यमयी पत्र तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए मुसीबत बन गया है, जिससे पार्टी की एकता पर सवाल उठने लगे हैं और औपचारिक विभाजन की आशंका गहरा गई है।

दिल्ली और कोलकाता के सत्ता के गलियारों में इस समय एक ही चर्चा जोरों पर है: 19 टीएमसी सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक कथित पत्र सामने आया है, जो एक अलग संसदीय समूह बनाने की ओर इशारा कर रहा है। इस घटनाक्रम ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर की दरारों को उजागर कर दिया है। इस सूची में काकोली घोष, शताब्दी रॉय, यूसुफ पठान और सायनी घोष जैसे नाम चर्चा में हैं, हालांकि इन हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता अभी भी बहस का विषय बनी हुई है।

कानूनी और राजनीतिक वास्तविकता

पार्टी नेतृत्व इस दावे को सिरे से खारिज कर रहा है। वरिष्ठ नेता महुआ मोइत्रा ने स्पष्ट किया है कि कोई भी सांसद अगर पार्टी छोड़ता है, तो उसे अपनी सदस्यता खोनी पड़ेगी और दोबारा चुनाव का सामना करना होगा। वहीं, पार्टी के भीतर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। अनुभवी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की है और बागी गुट से किसी भी संबंध को नकारा है, जबकि कीर्ति आजाद जैसे नेताओं का कहना है कि यह बाहरी राजनीतिक दबाव और केंद्रीय एजेंसियों के डर से पैदा किया गया संकट है।

यह उथल-पुथल केवल संसदीय दल तक सीमित नहीं है। हाल के दिनों में सीआईडी ने कथित हस्ताक्षरों की जालसाजी की जांच शुरू कर दी है, वहीं कई इस्तीफों ने संगठन की नींव हिला दी है। सुखेंदु शेखर और प्रकाश बराइक जैसे नेताओं के जाने के बाद 'एकनाथ शिंदे स्टाइल' बगावत की चर्चा तेज हो गई है, खासकर तब जब निष्कासित विधायक ऋतब्रत ने दावा किया है कि उन्हें 57 विधायकों का समर्थन प्राप्त है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह केवल आपसी मतभेद नहीं, बल्कि भारत के सबसे मजबूत क्षेत्रीय दलों में से एक के लिए एक बड़ी चुनौती है। जब आंतरिक असंतोष बंद कमरों से निकलकर सार्वजनिक इस्तीफों और पत्रों तक पहुंच जाए, तो यह पार्टी की आंतरिक व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। टीएमसी के लिए यह स्थिति काफी नुकसानदेह है। ममता और अभिषेक बनर्जी दिल्ली से स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेशों और आंतरिक असंतोष के बीच यह पार्टी के लिए पिछले कुछ वर्षों का सबसे बड़ा संकट है।

बड़ी तस्वीर

भविष्य की बात करें तो टीएमसी की स्थिरता विपक्षी खेमे के लिए बेहद अहम है। यदि पार्टी इस असंतोष को नहीं रोक पाई, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता का संतुलन बिगाड़ सकता है। चाहे यह विचारधारा का अंतर हो या विरोधियों की चाल, नतीजा यह है कि टीएमसी इस समय अपने ही आंतरिक संकटों में उलझी हुई है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि यह 'विभाजन' हकीकत है या पार्टी की पकड़ को कमजोर करने की एक सोची-समझी साजिश।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।