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वह मैली धोती जिसने तमिल सिनेमा बदल दिया: कैसे भारथिराजा ने स्टार सिस्टम को चुनौती दी

कैसे 'मैली धोती-कुर्ते' में आए भारथिराजा ने कमल हासन को '16 वयथिनिले' के लिए राजी किया

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 10 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
वह मैली धोती जिसने तमिल सिनेमा बदल दिया: कैसे भारथिराजा ने स्टार सिस्टम को चुनौती दी
वह मैली धोती जिसने तमिल सिनेमा बदल दिया: कैसे भारथिराजा ने स्टार सिस्टम को चुनौती दी

इस महान फिल्म निर्माता का जाना एक ऐसे युग का अंत है जिसने नायक की परिभाषा को फिर से लिखा, जिसकी शुरुआत युवा कमल हासन को दी गई एक अनूठी पिच से हुई थी।

तमिल सिनेमा की लोककथाओं में वह दृश्य आज भी दर्ज है: एक युवक दफ्तर में दाखिल होता है, उसकी धोती और शर्ट साफ तौर पर मैली है, और उसके हाथ में एक ऐसी स्क्रिप्ट है जो भारतीय सिनेमा की दिशा बदलने वाली थी। जब भारथिराजा 1977 में उभरते हुए सितारे कमल हासन को 16 वयथिनिले की कहानी सुनाने पहुंचे, तो उस दौर में 'नायक' की छवि पूरी तरह से पॉलिश किए हुए और गुड़िया जैसे दिखने वाले सितारों तक सीमित थी। कमल हासन, जो उस समय तक एक बड़ा नाम बन चुके थे, शायद उस बेतरतीब दिखने वाले व्यक्ति को केवल उसके पहनावे के आधार पर नजरअंदाज कर सकते थे। लेकिन इसके बजाय, उन्होंने उनकी बात सुनी।

उस बातचीत ने एक कल्ट क्लासिक को जन्म दिया। 16 वयथिनिले ने न केवल एक निर्देशक के करियर की शुरुआत की, बल्कि इसने मुख्यधारा की फिल्मों के ढर्रे को भी तोड़ दिया। जिस ग्रामीण यथार्थवाद (रूरल रियलिज्म) की उन्होंने कल्पना की थी, उसे पर्दे पर उतारने के लिए भारथिराजा को पूर्ण समर्पण की आवश्यकता थी। उन्होंने युवा कमल, उभरते हुए रजनीकांत और 14 वर्षीय श्रीदेवी को अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलने के लिए राजी किया।

पर्दे के पीछे का त्याग

यह फिल्म सितारों के लिए कोई दिखावे का प्रोजेक्ट नहीं थी। कमल हासन और रजनीकांत दोनों ने फिल्म को पूरा करने के लिए अपनी फीस में भारी कटौती की थी। श्रीदेवी के लिए भी यह बदलाव उतना ही बड़ा था; उन्होंने एक ऐसे किरदार को निभाने के लिए मेकअप और बनावटीपन को पूरी तरह त्याग दिया, जो कच्चा और मिट्टी से जुड़ा हुआ था।

कमल के लिए, यह अनुभव प्रतिभा को दिखावे से ऊपर रखने का एक सबक था। उन्होंने बाद में माना कि अगर उन्होंने उस मैली कपड़ों वाले व्यक्ति को वापस भेज दिया होता, तो वे अपने करियर के सबसे यादगार प्रदर्शनों में से एक को खो देते। यह एक ऐसा डी-ग्लैमराइज्ड किरदार था जिसने जेमिनी गणेशन या एवीएम राजन जैसे हैंडसम और पॉलिश किए हुए नायकों के प्रति इंडस्ट्री के जुनून को चुनौती दी।

यह क्यों मायने रखता है: 'गुड़िया जैसे चेहरों' के युग का अंत

भारथिराजा का प्रभाव उनकी पहली फिल्म से कहीं आगे तक गया। चार दशकों से अधिक के करियर में, उन्होंने साबित किया कि एक फिल्म निर्माता की 'प्रतिभा' उम्मीदों को तोड़ने की उसकी क्षमता में निहित है। अपने लीड एक्टर्स को उनकी स्टार वाली छवि से बाहर निकालकर, उन्होंने तमिल सिनेमा में चरित्र-प्रधान कहानियों की नींव रखी। 84 वर्ष की आयु में उनका निधन—1977 की शुरुआत से लेकर 2023 की मॉडर्न लव चेन्नई एंथोलॉजी तक फैले करियर के बाद—दृढ़ विश्वास की शक्ति की याद दिलाता है।

पैटर्न स्पष्ट है: सिनेमा की सबसे यादगार कृतियां अक्सर यथास्थिति को मानने से इनकार करने से शुरू होती हैं। भारथिराजा ने केवल अभिनेताओं का निर्देशन नहीं किया; उन्होंने ग्रामीण, ऊबड़-खाबड़ और 'मैले' को प्रामाणिक बनाकर प्रचलित स्टार सिस्टम को ध्वस्त कर दिया। यह एक ऐसी विरासत है जो यह सुनिश्चित करती है कि मैली धोती वाला वह आदमी भारतीय कहानी कहने की कला का एक दिग्गज बना रहेगा।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।