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विज्ञान और स्वास्थ्य

खामोश संकट: बच्चों का स्क्रीन टाइम उनके विकास में क्यों बन रहा है बाधा

अकेलापन और स्क्रीन टाइम बढ़ा रहा मासूमों की मुश्किलें

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 19 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
खामोश संकट: बच्चों का स्क्रीन टाइम उनके विकास में क्यों बन रहा है बाधा
खामोश संकट: बच्चों का स्क्रीन टाइम उनके विकास में क्यों बन रहा है बाधा

आधुनिक घरों में डिजिटल निर्भरता जैसे-जैसे बढ़ रही है, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि बढ़ता स्क्रीन टाइम और अकेलापन 'ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर' (ASD) के शुरुआती संकेतों को छिपा रहे हैं।

भारत भर के ड्राइंग रूम के शांत कोनों में एक सूक्ष्म बदलाव देखने को मिल रहा है। बच्चा नाम पुकारने पर मुड़ता नहीं है, नजरें मिलाने से बचता है, या खेल के मैदान की चहक के बजाय टैबलेट की चमकती स्क्रीन को प्राथमिकता देता है। हालांकि माता-पिता अक्सर इन व्यवहारों को केवल जिद या 'आधुनिक' बचपन का एक दौर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञ इसे लेकर चेतावनी दे रहे हैं। जिसे हम अक्सर स्वभावगत विशेषता मानते हैं, वह वास्तव में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के शुरुआती और अनसुने संकेत हो सकते हैं।

अदृश्य होती चुनौती

आंकड़े चिंताजनक हैं। हालिया डेटा बताता है कि लगभग हर 68 में से एक बच्चा अब ASD से प्रभावित है। अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल यूनिवर्सिटी के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और परीक्षा नियंत्रक डॉ. देवाशीष शुक्ला बताते हैं कि यह स्थिति बुद्धिमत्ता की कमी नहीं, बल्कि एक अलग तरह का न्यूरोलॉजिकल विकास है। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरणीय कारकों और जागरूकता के भारी अभाव का मिश्रण है।

कई शहरी और एकल परिवारों में, सामाजिक दायरा सिमटने से बच्चे पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक अकेले हो गए हैं। जब यह अकेलापन अत्यधिक स्क्रीन टाइम के साथ जुड़ जाता है—यानी घंटों टीवी या मोबाइल उपकरणों से चिपके रहना—तो मस्तिष्क के विकास पर इसका असर साफ दिखता है। हालांकि स्क्रीन से चिपके हर बच्चे को ऑटिज्म नहीं होता, लेकिन लगातार मिलने वाला डिजिटल स्टिमुलस बच्चे की संवाद करने, ध्यान केंद्रित करने और स्वाभाविक मानवीय संबंध बनाने की क्षमता को गंभीर रूप से बाधित कर सकता है।

यह क्यों जरूरी है: व्यापक परिप्रेक्ष्य

यह केवल पेरेंटिंग का मामला नहीं है; यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक बड़ी चिंता है। हम एक ऐसा पैटर्न देख रहे हैं जहां डिजिटल उपकरणों का 'सुविधाजनक' उपयोग उन स्थितियों के निदान में देरी कर रहा है, जिनमें शुरुआती हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। जब परिवार विकासात्मक देरी को केवल जिद समझ लेते हैं, तो वे थेरेपी के लिए मिलने वाले सुनहरे अवसर को खो देते हैं। ऑटिस्टिक बच्चों को हमारी सहानुभूति की नहीं, बल्कि सूचित और संरचनात्मक समर्थन की आवश्यकता है। चाहे वह स्पीच थेरेपी हो, व्यवहार संशोधन हो या विशेष शिक्षा, हस्तक्षेप जितनी जल्दी होगा, बच्चे के भविष्य पर उसका प्रभाव उतना ही गहरा होगा।

इस चक्र को कैसे तोड़ें

डेटा बताता है कि इस बदलाव का बोझ वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा रहा है, हालांकि स्थानीय चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि भारतीय परिवार कैसे अनुकूलन कर सकते हैं। जहां कुछ लोग उन्नत बाल चिकित्सा सहायता ढांचे के लिए संयुक्त अरब अमीरात जैसे क्षेत्रों में देखे जाने वाले अंतरराष्ट्रीय मानकों की ओर देखते हैं, वहीं इसका समाधान हमारे घर से ही शुरू होता है।

आगे बढ़ने के लिए हमें बच्चों के विकास को देखने के नजरिए में बदलाव लाना होगा। इसका मतलब है टैबलेट की जगह बातचीत को प्राथमिकता देना और डिजिटल जुड़ाव को शारीरिक खेल से बदलना। यदि आप किसी बच्चे को सामाजिक संकेतों को समझने में संघर्ष करते हुए, विशिष्ट गतिविधियों को बार-बार दोहराते हुए, या रोशनी और ध्वनि के प्रति अत्यधिक प्रतिक्रिया देते हुए देखते हैं, तो अंदाजा लगाना बंद करें। किसी विशेषज्ञ से परामर्श लें। लक्षणों को स्वीकार करना असफलता नहीं है—यह बच्चे की अद्वितीय क्षमता को अनलॉक करने की दिशा में पहला कदम है।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।