नाम बदलने का खेल: क्या फेडरेशन का नाम बदलने से बदलेगी भारतीय फुटबॉल की किस्मत?
No AIIF or buts, FFBWill get our goals
जैसे-जैसे राष्ट्रीय निकाय 'फुटबॉल फेडरेशन ऑफ भारत' के रूप में रीब्रांडिंग पर विचार कर रहा है, यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या केवल नाम बदलने से प्रशासनिक महत्वाकांक्षाओं और मैदान की हकीकत के बीच की खाई को भरा जा सकता है।
नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि नाम में ही किस्मत का वजन होता है। अब, इंडियन फुटबॉल फेडरेशन—यानी ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF)—भी इसी दर्शन को अपनाता दिख रहा है। 'फुटबॉल फेडरेशन ऑफ भारत' (FFB) में बदलाव की चर्चाओं के साथ, यह संस्था एक ऐसी बहस के केंद्र में है, जो प्रतीकात्मक रीब्रांडिंग को पेशेवर खेल विकास की कठिन और अक्सर नजरअंदाज की गई जरूरतों के खिलाफ खड़ा करती है।
सालों से, खेल की स्थिति चूके हुए अवसरों की एक कहानी रही है। जहाँ अन्य देश स्काउटिंग नेटवर्क और युवा अकादमियों में निवेश कर रहे हैं, वहीं भारतीय फुटबॉल अक्सर प्रशासनिक सुस्ती और राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ जाता है। एक नई पहचान अपनाने का कदम, जिसे कुछ पर्यवेक्षकों द्वारा ffbwill कहा जा रहा है, एक अधिक राष्ट्रवादी नामकरण की ओर झुकाव का संकेत देता है। फिर भी, आलोचकों के बीच बढ़ रही no aiif की भावना एक बुनियादी निराशा को उजागर करती है: प्रशंसक स्कोरबोर्ड पर परिणाम देखना चाहते हैं, न कि केवल लेटरहेड पर बदलाव।
प्रतीकवाद की कीमत
ऐतिहासिक रूप से, भारतीय खेल बुनियादी ढांचे और जमीनी स्तर के विकास के साथ संघर्ष करते रहे हैं। स्कूलों में सुलभ प्रशिक्षण मैदानों की कमी से लेकर प्रतिभाओं की मजबूत पाइपलाइन के अभाव तक, बाधाएं संरचनात्मक हैं, न कि नाममात्र। जब कोई संस्था अपना ध्यान रीब्रांडिंग अभ्यास पर केंद्रित करती है, तो वह अपनी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है। यदि खेल की economic वास्तविकता में प्रायोजन की कमी और लीग के प्रदर्शन में निरंतरता का अभाव शामिल है, तो क्या एक नया नाम वह world-क्लास प्रोत्साहन दे पाएगा जिसकी हितधारकों को तलाश है?
इस बदलाव के पीछे का तर्क पहचान की शक्ति पर आधारित प्रतीत होता है। भारत के नामकरण के साथ जुड़कर, फेडरेशन संस्थागत शीर्षकों के विऔपनिवेशीकरण (decolonising) के व्यापक चलन का हिस्सा बन रहा है। हालाँकि, fifa द्वारा शासित अंतरराष्ट्रीय मंच, आंतरिक नामकरण परिवर्तनों के प्रति काफी हद तक उदासीन रहता है। footballing के संदर्भ में सफलता रैंकिंग और टूर्नामेंट में प्रगति से मापी जाती है, जिसके लिए निरंतर निवेश और सुसंगत नीति की आवश्यकता होती है, न कि केवल रंग-रोगन की।
यह क्यों मायने रखता है
यह रीब्रांडिंग भारत में शासन के एक व्यापक पैटर्न का लक्षण है, जहाँ संस्थाएं अक्सर पुराने प्रदर्शन के मुद्दों को प्रशासनिक नामकरण के जरिए हल करने की कोशिश करती हैं। हालाँकि प्रतीकवाद राष्ट्रीय गौरव की भावना को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन यह व्यवस्था के भीतर की गहरी खामियों को छिपाने का जोखिम भी उठाता है। यदि फेडरेशन इस नई पहचान के साथ कोचिंग, स्काउटिंग और बुनियादी ढांचे में ठोस सुधार नहीं करता है, तो नाम परिवर्तन को अंततः ध्यान भटकाने वाला कदम माना जाएगा।
कुलीन टीमों के साथ प्रतिस्पर्धा करने का रास्ता जीते गए मैचों और बनाई गई प्रणालियों से होकर गुजरता है। जब तक फेडरेशन यह साबित नहीं कर देता कि उसकी प्रशासनिक ऊर्जा उन युवा क्लबों और क्षेत्रीय लीगों की ओर निर्देशित है जो वास्तव में प्रतिभा पैदा करते हैं, तब तक इस रीब्रांडिंग को एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक के बजाय एक दिखावटी कवायद के रूप में ही देखा जाएगा। जैसा कि कहा जाता है, खेल घास पर खेला जाता है, रजिस्ट्री के कागजों पर नहीं।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।