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द मिरर टेस्ट: आशा पारेख और जया बच्चन ने सेट पर कैसे तय की थीं अपनी सीमाएं

आशा पारेख ने निर्देशक से उनकी अपनी बेटी के बारे में सवाल पूछकर एक रिवीलिंग कॉस्ट्यूम पहनने से इनकार कर दिया था

द्वारा विश्व डेस्कप्रकाशित 8 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
द मिरर टेस्ट: आशा पारेख और जया बच्चन ने सेट पर कैसे तय की थीं अपनी सीमाएं
द मिरर टेस्ट: आशा पारेख और जया बच्चन ने सेट पर कैसे तय की थीं अपनी सीमाएं

दिग्गज अभिनेत्रियों ने अभिनेत्रियों के वस्तुकरण पर अपनी राय रखी है, ऐसे समय में जब आधुनिक सिनेमा को असहज फिल्मांकन के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।

फिल्म सेट पर पावर डायनामिक्स अक्सर झुके हुए होते हैं, लेकिन आशा पारेख के लिए इसका समाधान एक सीधा और तीखा सवाल था। दशकों पहले, जब एक निर्देशक ने उन्हें एक डांस सीक्वेंस के लिए रिवीलिंग कॉस्ट्यूम पहनने का दबाव डाला, तो वह किसी बहस में नहीं पड़ीं। इसके बजाय, उन्होंने निर्देशक की आंखों में देखकर पूछा, "क्या आप खुश होंगे अगर आपकी बेटी यह कॉस्ट्यूम पहने?" उस पोशाक की मांग तुरंत खत्म हो गई। यह शांत लेकिन दृढ़ विरोध उस दौर की पहचान है, जहां पारेख और जया बच्चन जैसी अभिनेत्रियों ने सख्त व्यक्तिगत मानक तय करके इंडस्ट्री में अपना रास्ता बनाया।

सौंदर्य से शोषण की ओर बदलाव

ऐसे माहौल में जहां 'पेडी' (Peddi) जैसी हालिया रिलीज फिल्मों को जाह्नवी कपूर के आपत्तिजनक फिल्मांकन और क्लोज-अप शॉट्स के लिए भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, इंडस्ट्री दिग्गजों की ओर देख रही है। आशा पारेख का मानना है कि आज की कलाकार निस्संदेह खूबसूरत हैं, लेकिन उन्हें अक्सर ऐसे लेंस से देखा जाता है जो गरिमा के बजाय शोषण को प्राथमिकता देता है। वह इसकी तुलना संजय लीला भंसाली जैसे फिल्म निर्माताओं के काम से करती हैं, जो उनकी नजर में महिलाओं को ऐसी सौंदर्यपूर्ण गरिमा के साथ पेश करते हैं जो ग्लैमरस भी है और सम्मानजनक भी। उनके लिए, समस्या ग्लैमर नहीं, बल्कि इसे पर्दे पर दिखाने के पीछे की नीयत की कमी है।

जया बच्चन ने भी अपने लंबे करियर के दौरान पेशेवर अखंडता बनाए रखने के बारे में खुलकर बात की है। वह याद करती हैं कि हालांकि उन्हें शायद ही कभी ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन मनोज कुमार द्वारा निर्देशित फिल्म 'शोर' की शूटिंग के दौरान उन्हें एक अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ा था। अपने कंफर्ट से समझौता करने के बजाय, उन्होंने एक रेखा खींचना बेहतर समझा और फिर कभी उस निर्देशक के साथ काम नहीं किया। दोनों महिलाओं के लिए, सबक स्पष्ट है: इंडस्ट्री की किसी खास लुक या कॉस्ट्यूम की मांग उतनी ही शक्तिशाली होती है, जितनी उसे अनुमति दी जाती है।

आधुनिक दुविधा

यह बातचीत अनिवार्य रूप से अभिनेत्रियों की वर्तमान पीढ़ी की ओर मुड़ गई है। तापसी पन्नू, जो इस चल रही बहस पर अपनी बात रखती हैं, का सुझाव है कि यह असुविधा अक्सर फिल्म निर्माण की तकनीकी वास्तविकता से उत्पन्न होती है। वह कहती हैं, "जब तक कैमरा है, तब तक अजीब एंगल तो होंगे ही," और इस बात पर जोर देती हैं कि आज के सितारों को अपनी जगह और फ्रेमिंग के प्रति बेहद जागरूक रहना चाहिए। फिर भी, समकालीन सिनेमा में किरदारों के 'यौनिकरण' (sexualisation) के खिलाफ विरोध यह दर्शाता है कि दर्शक भी अब इस बात के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहे हैं कि उनके पसंदीदा सितारों को कैसे दिखाया जा रहा है।

यह क्यों मायने रखता है

यह चर्चा इस बात में एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित करती है कि हम भारतीय अभिनेत्रियों की एजेंसी को कैसे देखते हैं। वर्षों तक, 'हीरोइन का बोझ' केवल ग्लैमर का तड़का बने रहना था, अक्सर उनकी अपनी मर्जी की कीमत पर। यह तथ्य कि पारेख और बच्चन जैसी दिग्गज अब इस पर खुलकर बोल रही हैं, यह बताता है कि इंडस्ट्री में 'कास्टिंग काउच' और 'कॉस्ट्यूम कल्चर' पर बहस अभी खत्म नहीं हुई है। यह उस वस्तुकरण के प्रति बढ़ती असहिष्णुता को उजागर करता है जिसे कभी 'काम का हिस्सा' मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता था। जैसे-जैसे दर्शक अधिक यथार्थवादी और सम्मानजनक कहानियों की मांग कर रहे हैं, इंडस्ट्री को यह अहसास हो सकता है कि निर्देशक से 'बेटी वाला सवाल' पूछने की पुरानी तकनीक अगली पीढ़ी के कलाकारों के लिए एक मानक बनती जा रही है।

द्वारा विश्व डेस्क
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