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मशीन में छिपा 'भूत': कैसे एल्गोरिदम पश्चिम बंगाल में बदल रहे हैं वोटरों का नक्शा

भारतीय सीमा पर दस्तावेज़: चुनाव, नागरिकता और एल्गोरिदम के घेरे में संदिग्ध वोटर

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 27 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
मशीन में छिपा 'भूत': कैसे एल्गोरिदम पश्चिम बंगाल में बदल रहे हैं वोटरों का नक्शा
मशीन में छिपा 'भूत': कैसे एल्गोरिदम पश्चिम बंगाल में बदल रहे हैं वोटरों का नक्शा

पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में तकनीक आधारित मतदाता सूची के बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण ने लाखों नागरिकों को अपनी पहचान साबित करने के संघर्ष में धकेल दिया है।

पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों के नदी-नालों वाले इलाकों में, हालिया विधानसभा चुनावों में सबसे शक्तिशाली हथियार कोई चुनावी भाषण नहीं, बल्कि एक एल्गोरिदम था। जैसे-जैसे राज्य चुनावों की ओर बढ़ रहा था, एक खामोश नौकरशाही प्रक्रिया के जरिए नामों को हटाने का काम चल रहा था। 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) नामक प्रक्रिया के माध्यम से, भारत के चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटा दिए। 'चर' (नदी के बीच बनने वाले द्वीप) की बदलती रेत पर रहने वाले लोगों के लिए, यह सिर्फ एक तकनीकी अपडेट नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व का संकट था।

बहिष्करण का गणित

इन नामों को हटाने का पैमाना चौंकाने वाला है: राज्य के कुल मतदाताओं में से लगभग 12% को 'अयोग्य' या 'संदिग्ध' चिह्नित किया गया। हालांकि चुनाव आयोग SIR को मतदाता सूची को साफ करने की एक मानक प्रक्रिया बताता है, लेकिन इसका क्रियान्वयन किसी लक्षित परिणाम की ओर इशारा करता है। ये नाम मुख्य रूप से उन सीमावर्ती निर्वाचन क्षेत्रों से हटाए गए जो लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के गढ़ रहे हैं। इन मतदाताओं को 'तार्किक विसंगतियों' (logical discrepancies) के आधार पर चिह्नित करके, सिस्टम ने प्रभावी रूप से मुस्लिम और दलित आबादी वाले क्षेत्रों में वोट बैंक को ध्वस्त कर दिया।

प्रभावित जिलों, विशेषकर मुर्शिदाबाद के आंकड़े एक असमान पैटर्न दिखाते हैं। हालांकि हिंदू—जिनमें मुख्य रूप से हाशिए पर रहने वाले दलित और आदिवासी समुदाय शामिल हैं—उन्हें भी बड़े पैमाने पर हटाने का सामना करना पड़ा, लेकिन हटाए गए मुस्लिम मतदाताओं का अनुपात काफी अधिक है। मुर्शिदाबाद में, आधे से अधिक मतदाताओं को 'निर्णयाधीन' (under adjudication) स्थिति में डाल दिया गया, जिससे मतदान से पहले ही उनकी आवाज को प्रभावी ढंग से दबा दिया गया।

पारदर्शिता के बिना तकनीक

विवाद तब और गहरा गया जब रिपोर्टें आईं कि चुनाव आयोग ने पुनरीक्षण प्रक्रिया के बीच में ही जटिल एल्गोरिदम पेश किए। 'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' की जांच के अनुसार, इन डिजिटल उपकरणों को बिना किसी स्थापित प्रोटोकॉल, मैनुअल या नागरिकता की पुष्टि करने वाले फील्ड अधिकारियों के लिए लिखित निर्देशों के बिना लागू किया गया था।

निगरानी के इस अभाव ने मतदाता सूची को एक अस्थिर दस्तावेज बना दिया। जब मानवीय विवेक की जगह अपारदर्शी सॉफ्टवेयर ले लेता है, तो सबूत पेश करने का बोझ पूरी तरह से नागरिक पर आ जाता है। उन परिवारों के लिए, जिनका जीवन पहले से ही सीमा के अनिश्चित भूगोल से परिभाषित है, डिजिटल 'तार्किक विसंगति' को संतुष्ट करने के लिए सही दस्तावेज जुटाना अक्सर एक असंभव बाधा बन जाता है।

यह क्यों मायने रखता है

यह चलन भारतीय चुनावों के प्रबंधन में एक बदलाव का संकेत है: नागरिकता सत्यापन का डिजिटलीकरण तेजी से राजनीतिक जनसांख्यिकी को फिल्टर करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। जब एल्गोरिदम-आधारित छंटनी के जरिए मतदाता सूचियों में हेरफेर किया जाता है, तो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की नींव दरकने लगती है। पैटर्न स्पष्ट है—तकनीक का उपयोग बड़े पैमाने पर 'संदिग्ध' स्थिति पैदा करने के लिए किया जा रहा है, जिससे वोट देने का बुनियादी अधिकार एक अनिश्चित विशेषाधिकार बन गया है, जिसके लिए लगातार दस्तावेजों के साथ बचाव करना पड़ता है। यदि मतदाता को सत्यापित करने की प्रक्रिया ही बहिष्कार का तंत्र बन जाए, तो हम उस तरीके में एक बुनियादी बदलाव देख रहे हैं जिससे राज्य यह तय करता है कि राष्ट्र का हिस्सा कौन है।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।