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बड़ा चुनावी सुधार: मतदाता सूची से छह करोड़ से अधिक नाम हटाए गए

एक साल से जारी है SIR अभियान; मतदाता सूची से छह करोड़ से अधिक नाम हटाए गए

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 27 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
बड़ा चुनावी सुधार: मतदाता सूची से छह करोड़ से अधिक नाम हटाए गए
बड़ा चुनावी सुधार: मतदाता सूची से छह करोड़ से अधिक नाम हटाए गए

जैसे-जैसे भारत का राष्ट्रव्यापी मतदाता सूची सुधार अभियान अपने तीसरे चरण में प्रवेश कर रहा है, इस बड़े सफाई अभियान ने हमारे लोकतांत्रिक डेटाबेस की अखंडता और प्रबंधन पर बहस छेड़ दी है।

आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पिछले एक साल में, भारत की सिस्टेमैटिक इलेक्टोरल रिफॉर्म (SIR) पहल ने मतदाता सूची से छह करोड़ से अधिक प्रविष्टियों को हटा दिया है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सटीकता को बेहतर बनाने के लिए शुरू किया गया यह प्रयास हाल के इतिहास के सबसे बड़े प्रशासनिक अभ्यासों में से एक बन गया है, जिसने 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चुनावी परिदृश्य को काफी हद तक बदल दिया है।

सफाई का दायरा

SIR का प्राथमिक उद्देश्य प्रणालीगत खामियों—जैसे मृत मतदाता, दोहरी प्रविष्टियां और एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत व्यक्तियों की समस्या को दूर करना था। कुल हटाए गए नामों में से 66 लाख नाम पंजीकृत मतदाता की मृत्यु के कारण हटाए गए। इसके अलावा, 63 लाख नाम प्रशासनिक विसंगतियों, जैसे कि दोहरी पंजीकरण और पते की त्रुटियों के कारण हटाए गए।

सबसे गहन गतिविधि दूसरे चरण में देखी गई, जहां उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु सहित 12 राज्यों में मतदाताओं की संख्या 50.99 करोड़ से घटकर 45.81 करोड़ रह गई। यह उन क्षेत्रों के कुल चुनावी आधार में 10.2% की कमी को दर्शाता है। अकेले उत्तर प्रदेश में 2.04 करोड़ नाम हटाए गए, हालांकि इस प्रक्रिया के दौरान 84 लाख नए और सत्यापित मतदाताओं को भी सिस्टम में जोड़ा गया।

चरणबद्ध तरीके से क्रियान्वयन

इस पहल की शुरुआत जुलाई 2024 में हुई, जब बिहार को SIR के पहले चरण के लिए परीक्षण स्थल बनाया गया। विधानसभा चुनावों से पहले बिहार में 65 लाख नाम हटाए जाने पर तत्काल राजनीतिक जांच और सार्वजनिक बहस छिड़ गई। उस अनुभव से सीखते हुए, अक्टूबर 2025 में दूसरा चरण शुरू किया गया, जिसका दायरा एक दर्जन राज्यों तक फैलाया गया।

वर्तमान में, 14 मई को शुरू हुआ तीसरा चरण देश के एक बड़े हिस्से में चल रहा है, जिसमें पंजाब और कर्नाटक से लेकर दिल्ली और ओडिशा तक के राज्य शामिल हैं। अधिकारियों का लक्ष्य इस साल के अंत तक इस बड़े ऑडिट को पूरा करना है, ताकि एक अधिक सटीक और व्यवस्थित मतदाता सूची तैयार की जा सके।

यह क्यों महत्वपूर्ण है: अखंडता का विरोधाभास

प्रशासनिक दृष्टिकोण से, यह बड़े पैमाने पर 'सफाई' की प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र के लिए दोधारी तलवार है। एक ओर, एक सटीक और अद्यतन सूची बनाए रखना चुनावी धोखाधड़ी को रोकने और हर निर्वाचन क्षेत्र के जनसांख्यिकीय डेटा को विश्वसनीय बनाए रखने के लिए एक तकनीकी आवश्यकता है। एक त्रुटिपूर्ण सूची ऐसी कमजोरी है जो 'घोस्ट वोटिंग' (फर्जी मतदान) के आरोपों को बढ़ावा देती है।

हालांकि, इन विलोपनों की गति और पैमाना प्रशासनिक चूक के बारे में चिंताएं पैदा करता है। जब इतने कम समय में लाखों नाम हटा दिए जाते हैं, तो यह जिम्मेदारी व्यक्ति पर आ जाती है कि वह सुनिश्चित करे कि लिपिकीय त्रुटियों के कारण उनके वोटिंग अधिकार रद्द न हो जाएं। राजनीतिक दलों के लिए, ये सूचियां चुनावी रणनीति का आधार होती हैं; इतने बड़े पैमाने पर अचानक बदलाव रातों-रात हर निर्वाचन क्षेत्र का 'गणित' बदल देता है। जैसे-जैसे तीसरा चरण आगे बढ़ रहा है, SIR की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने नाम हटाए गए, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि इस प्रक्रिया में कितने वास्तविक नागरिक गलती से बाहर हो गए।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।